कॉफी कनेक्शन

जयपुर और भोपाल में रहने वाले राघव और रिद्धिमा की ऑनलाइन दोस्ती, भावनात्मक जुड़ाव और प्लैटोनिक सोलमेट रिश्ते को दर्शाता चित्र।

सुरेश परिहार, पुणे

राघव अक्सर कहता था-
दूरी शहरों के बीच होती है… रिश्तों के बीच नहीं.
रिद्धिमा हर बार मुस्कुराकर जवाब देती-और कुछ लोग मिलकर भी दूर रहते हैं… कुछ बिना मिले भी अपने हो जाते हैं.
राघव जयपुर में रहता था.रिद्धिमा भोपाल में.
दोनों की उम्र चालीस के पार थी. जीवन ने दोनों को बहुत कुछ सिखा दिया था. दोनों अपने-अपने करियर में स्थापित थे. दोनों ने रिश्तों की धूप भी देखी थी और छाँव भी. अब उन्हें किसी रोमांच की तलाश नहीं थी, केवल सुकून चाहिए था. उनकी मुलाकात किसी डेटिंग ऐप पर नहीं हुई थी. वे एक ऑनलाइन साहित्यिक मंच पर मिले थे.राघव खबरें लिखता था. तथ्य उसके लिए धर्म थे.
रिद्धिमा कहानियाँ लिखती थी. भावनाएँ उसके लिए जीवन थीं.शुरुआत एक कविता पर टिप्पणी से हुई थी.
फिर किताबों पर बात होने लगी.
फिर संगीत…
फिर जीवन…
और धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के दिन का सबसे शांत हिस्सा बन गए.
सुबह की पहली गुड मॉर्निंग और रात की आख़िरी अपना ध्यान रखना के बीच न जाने कितनी बातें गुजरती थीं. मज़े की बात यह थी कि दोनों ने कभी एक-दूसरे से यह नहीं पूछा-तुम मुझसे प्यार करते हो? क्योंकि दोनों जानते थे कि हर गहरा रिश्ता प्रेम नहीं होता. एक दिन रिद्धिमा ने पूछा-तुम्हें मेरी सबसे अच्छी बात क्या लगती है? राघव ने बिना सोचे कहा-तुम मुझे बदलने की कोशिश नहीं करती… बेहतर बनने की प्रेरणा देती हो.
रिद्धिमा हँस पड़ी.
और तुम्हारी सबसे अच्छी बात पता है क्या है?
क्या?
तुम मेरे टूटे हुए दिनों को ठीक नहीं करते… बस मेरे साथ बैठ जाते हो.
कुछ देर दोनों चुप रहे.
वह चुप्पी भी बातचीत का हिस्सा थी.
धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि उनके बीच एक ऐसा रिश्ता जन्म ले चुका है, जिसे किसी नाम की ज़रूरत नहीं थी.राघव किसी बड़ी सफलता की खबर सबसे पहले रिद्धिमा को भेजता. रिद्धिमा कोई नई कहानी लिखती, तो सबसे पहले राघव पढ़ता. राघव उसकी व्याकरण ठीक करता. रिद्धिमा उसकी भाषा में संवेदनाएँ जोड़ देती. दोनों एक-दूसरे की कमियाँ नहीं छिपाते थे.वे एक-दूसरे को बेहतर बनाते थे.यही उनकी दोस्ती की सबसे बड़ी खूबसूरती थी.एक शाम वीडियो कॉल पर रिद्धिमा बहुत शांत थी.
राघव ने पूछा-सब ठीक है?
हाँ…
झूठ बोल रही हो.
कैसे पता?
तुम जब दुखी होती हो, तो हाँ लिखती नहीं… स़िर्फ बोलती हो.
रिद्धिमा मुस्कुरा दी.
तुम्हें मेरी इतनी आदत हो गई है?
आदत नहीं…
तुम मेरी स़ेफ स्पेस हो. पहली बार रिद्धिमा ने अंग्रेज़ी का यह शब्द अपने लिए सुना था. उसने पूछा-मतलब?
राघव बोला-
मतलब… दुनिया के सामने मुझे मजबूत बनने की ज़रूरत पड़ती है.
तुम्हारे सामने नहीं.उस दिन दोनों ने कोई साहित्य नहीं पढ़ा.
कोई कविता नहीं लिखी.
स़िर्फ चुप्पी साझा की.
और शायद वही उनकी सबसे लंबी बातचीत थी.
कभी-कभी राघव कह देता- मन करता है तुम्हारे शहर आकर बस एक कप कॉफी पी लूँ.
रिद्धिमा हँस देती…कॉफी पीने आना… ज़िंदगी बदलने नहीं.
डरती हो?
नहीं…
बस कुछ रिश्ते जितनी दूरी में खूबसूरत लगते हैं, उतनी नज़दीकी में नहीं.
राघव समझ जाता.
वह जानता था कि रिद्धिमा उसे बहुत मानती है.
रिद्धिमा भी जानती थी कि राघव के मन में उसके लिए एक कोमल आकर्षण है.
लेकिन दोनों ने कभी उस आकर्षण को रिश्ते का नाम नहीं बनने दिया.
क्योंकि वे जानते थे
हर एहसास को प्रेम कहना, हर रिश्ते के साथ न्याय नहीं होता.एक दिन सोशल मीडिया पर किसी ने टिप्पणी लिखी
लड़का-लड़की कभी स़िर्फ दोस्त नहीं हो सकते.रिद्धिमा ने वह पोस्ट राघव को भेजी. राघव ने जवाब दिया-शायद इसलिए लोग दोस्ती की सबसे खूबसूरत शक्ल देखने से चूक जाते हैं.
समय बीतता गया.
शहर वही रहे.
दूरी वही रही.
लेकिन दोनों के भीतर बहुत कुछ बदल गया.
राघव अब पहले से अधिक संवेदनशील हो गया था.
रिद्धिमा पहले से अधिक निडर.
दोनों ने एक-दूसरे की ज़िंदगी में कोई बड़ा वादा नहीं किया.
न साथ जीने का.
न साथ मरने का.
उन्होंने बस एक वादा निभाया
जब भी दुनिया तुम्हें गलत समझेगी… मैं पहले तुम्हें समझूँगा.
एक दिन रिद्धिमा ने पूछा
अगर किसी दिन हमारी बात होना बंद हो गई तो?
राघव ने मुस्कुराकर कहा-तब भी तुम मेरी लिखी हर पंक्ति में रहोगी…
और मैं तुम्हारी हर कहानी के किसी शांत पात्र में.
रिद्धिमा ने पहली बार बिना किसी इमोजी के स़िर्फ एक शब्द लिखा
धन्यवाद…राघव ने लिखा
किसलिए?
मेरी ज़िंदगी में प्रेम बनकर नहीं…विश्वास बनकर आने के लिए.
स्क्रीन के उस पार राघव मुस्कुरा रहा था.स्क्रीन के इस पार रिद्धिमा की आँखें नम थीं. दोनों जानते थे कि उनके बीच जो था, वह प्रेम से कम नहीं था…लेकिन प्रेम कहलाने की ज़िद भी नहीं करता था.
शायद आज की जेनजी इसे प्लेटोनिक साउलमेट कहे. पुरानी पीढ़ी इसे आत्मिक मित्रता कहती.और वे दोनों?वे इसे बस इतना कहते थे
तुम हो… इसलिए मैं थोड़ा बेहतर इंसान हूँ.क्योंकि हर रिश्ता साथ रहने के लिए नहीं बनता. कुछ रिश्ते स़िर्फ इतना सिखाने आते हैं कि बिना किसी अधिकार के भी किसी का सबसे सुरक्षित ठिकाना बना जा सकता है. शायद यही प्रेम का सबसे परिपक्व रूप है…जहाँ नाम से ज़्यादा, निभाना मायने रखता है.

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