
कंचनमाला “अमर” (उर्मी)
नेहा समझ नहीं पा रही थी कि एक छोटी-सी गलती से आखिर इतना बदलाव किसी ऐसे इंसान में कैसे आ सकता है, जिसके प्यार में उसने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था। जिससे हर बात साझा करने की उसे आदत हो गई थी। अचानक एक छोटी-सी गलती पर उसका यूँ मुँह मोड़ लेना नेहा के लिए मृत्यु से कम नहीं था।
उसे आज यह समझ आ रहा था कि किसी का जीते-जी ज़िंदगी से चले जाना, किसी की मृत्यु के दुःख से कम नहीं होता। इसी उहापोह में वह कमरे में अकेली बैठी थी। दुःख कम होने का नाम नहीं ले रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे दिल लहूलुहान होकर रिस रहा हो। धड़कनें बेकाबू होती जा रही थीं।
जब से राकेश ने बात करना बंद कर दिया था, उसने खाना-पीना भी बंद कर दिया था। उस अँधेरे कमरे में बैठी वह रोए जा रही थी। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
तभी अचानक बहुत दिनों बाद विवेक का मैसेज आता है—
“Hiiiii”
विवेक से उसकी जान-पहचान किसी ऑफिसियल ट्रेनिंग के दौरान ही हुई थी। तब से अक्सर उससे व्हाट्सऐप पर बातचीत हो जाया करती थी। मगर इधर काफी दिनों से नेहा से उसकी बातचीत नहीं हुई थी।
आज अचानक जब उसका मैसेज आया तो नेहा अपना ध्यान बाँटने के लिए उससे ऑफिस में चल रही ट्रेनिंग के संदर्भ में पूछताछ करने लगी। फिर विवेक ने कॉल ही कर दिया और हँसते हुए कहा—
“मैम, टाइपिंग में बहुत वक्त लग रहा था। सोचा आपसे कॉल पर ही बात कर लूँ।”
नेहा फिर से उससे उसी ट्रेनिंग के बारे में पूछताछ करने लगी। तभी विवेक ने नेहा की बात को बीच में ही काटते हुए कहा—
“मैम, आप ठीक हो?”
नेहा ने कहा—
“हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
विवेक मायूसी से गहरी साँस लेते हुए कहता है—
“नहीं, आप बिल्कुल ठीक नहीं हो। बताइए मुझे… क्या हुआ?”
नेहा टालमटोल करती रही। उसे यकीन दिलाने की कोशिश करती रही कि वह ठीक है।
मगर विवेक ने जब यह कहा—
“आप यूँ ही मुझे दोस्त कहते हो? अपना दर्द साझा नहीं करना चाहते?”
विवेक के इतना कहते ही नेहा फफक कर रो पड़ी। फिर भी उसने उसे कुछ नहीं बताया, क्योंकि कई बार दर्द इतना गहरा होता है कि उसे बयां करने के लिए शब्द नहीं होते।
मगर उस वक्त विवेक की संजीदगी और उसके लिए उसकी फिक्र ने उसे बेहिसाब सुकून दिया। सच है, कभी-कभी हमें किसी से कुछ नहीं चाहिए होता, सिवाय इसके कि कोई हमारी पीड़ा को शिद्दत से महसूस करे।
कभी-कभी किसी बदलते रिश्ते के दर्द के बीच वही रिश्ता हमें सुकून दे जाता है, जिसे हमने कभी रिश्ता माना ही नहीं होता।
