
अंजू निगम लखनऊ
बहुत ही प्यारा रिश्ता होता है प्रगाढ़ दोस्ती का। हर बात का साझेदार। इस मुकम्मल से रिश्तें पर वक्त की कोई धूल नहीं लगती। अपनेपन की ऐसी गरमाहट बस्ती है जैसे सर्दियों की कुनकुरी धूप। गहराई तो मानो समुद्र को नाप लो। ऐसी एक दोस्ती पर मन तो करता ही है न , न्यौछावर हो जाया जायें और जब दोस्ती के जिस्म ने बचपन के लिबास ओढ़े हों तो अहसास अलहदा सा ही होता है। जब कोई दर्द बेइंतहा सिमट रहा हो आंखों में तो एक कंधा मौजूद रहता है बिना किसी शिकन के। इस अहसास में सुकून का दरिया बहता है कि कोई है जो हमेशा आपके साथ चलता है,आपके साथ रहता है। इस लफ़्ज़ की ताकत ने गुलजार साहब की कलम से ये लिखवा लिया,
दोस्तों के नाम का एक खत
जेब में रख कर क्या चला…
करीब से गुजरने वाले पूछते
इत्र का नाम क्या है…
ऐसा इत्र तो मैंने भी अपनी जेब में रख लिया है जिसकी महक मेरे इस दोस्त के आसपास होने का अहसास दिलाती रहती है। किरन से मेरी
दोस्ती करीब पैंतीस साल पुरानी है।
मैं केन्द्रीय विद्यालय की विधार्थी थी और जब दसवीं पास कर ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला लिया तो हमें अर्मापुर केन्द्रीय विद्यालय को छोड़ कर आई.आई.टी केन्द्रीय विद्यालय जाना पड़ा। मुझे जो विषय लेने थे वे पुराने विद्यालय में नहीं थे।
वहीं मैं पहली बार किरण से मिली। उसके सौम्य व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित किया। दुबली-पतली उस लड़की से मेरा मन जुड़ गया और इतने सालों में यह रिश्ता और मजबूत ही होता गया।
स्कूल के उन दो सालों में ऐसे बहुत से मौके आयें जिसे हमने जी भरकर ,जी के देखा।ऐसा बेफिक्र सा जीना अब नहीं हो पाता।
किरण और मेरा स्वभाव लगभग एक साल ही था जिससे हमारी बातचीत का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। स्कूल की तरफ से आयोजित की सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हमारा हमेशा दखल रहा। एक समूह नृत्य जो कश्मीरी बोली , शायद “कश्तबाड़ी” में था,हमने कश्मीरी नृत्य किया जिसकी याद एक सामूहिक फोटो में आज भी संभाल कर रखी गई है। अब कोई हमें देखें तो ये यकीन करना मुश्किल होगा कि ये हम वही दो दोस्त है।
उस बचपन वाले खिलंदड़े दिनों में हमने भी क्लास बंक की थी। अपनी क्लास के लड़कों को विधालय परिसर के बाहर से समोसे लाने भेजा था। हमने भी स्कूल के अध्यापकों के “निकनेम” रखें थे। जोजो, पपेट, टेम्पों, बोरोलीन। हमने भी “एस.यू.पी.डब्लयू” यानि सोशल यूजफुल प्रोडेक्टिव वर्क में खूब खुराफातें की है। ये विषय तो लिया भी बस इसलिए था कि इसमें अच्छे नंबर मिल जाते थे और हमारे रिपोर्ट कार्ड वजनी लगते थे। उस समय के हमारे खेल भी तो अलग ही होते थे। बारहवीं में आकर भी हमने लंच-ब्रेक में चोर- सिपाही खेलने से परहेज़ नहीं किया।
मुझे याद आता है कि हम स्कूल परिसर के चारों ओर लगे कांटेदार तारों को ऊपर-नीचे करके बाहर निकलने की जगह बनाते थे और बाहर खड़े ठेले से “झालमूंड़ी” खाते थे। अहा! वो स्वाद अब भी मुंह में घुल रहा है। अक्सर किसी के जन्मदिन पर हम ऐसा भगोड़ापन करते थे। बजट ज्यादा होता था तो पास ही बने कैफिटेरिया में चाऊमीन खाते थे।
बारहवीं कक्षा के बच्चों को जब “एक दिन का अध्यापक/अध्यापिका” बनाया गया तो हमने उस दिन की तैयारी में कितने दिन लगायें थे। खासकर कौन सी साड़ी पहन कर जायेंगे। पहली बार साड़ी पहन कर स्कूल जाने में कितनी झिझक लग रही थी और हमने अपने को खूब कोसा भी कि बहुत शौक था न टीचर बनने का , अब झेलो। शुरू की एक दो क्लास के बच्चों ने तो हमारा बड़ा फलीता बनाया लेकिन थोड़ी सीनियर क्लास के बच्चों को हमने खूब मन से पढ़ाया। इस दिन को भी हमने कैमरे में कैद कर लिया, हमेशा के लिए।
स्कूल और कॉलेज के बाद हम दोनों अलग-अलग शहरों में बस गये। चिढ्ठी-पत्री का भी सहारा नहीं रहा क्योंकि एक दूसरे के पते नहीं थे। फेसबुक ने फिर हमें मिलाया और बहुत खूब मिलाया। भूली-बिसरी बातों का अनंत प्रवाह था जिसमें हमारे मन बहते चले गये। किरण के गृह प्रवेश , उसकी पच्चीसवीं सालगिरह, उसकी बेटी की शादी और मेरी पच्चीसवीं सालगिरह में शामिल होना चलता रहा।
हम एक ही शहर में अब आगे की खुराफातें करते रहे , ऐसा हम हमेशा चाहेंगे। ऐसे दोस्त भी अब कहां मिलते हैं।
गुलजार साहब ने दोस्ती को निहायत शानदार जामा पहनाया है
ये दोस्ती का गणित है साहब यहां दो में से
एक भी गया तो बाकी कुछ नहीं बचता।
हम तो यही मनाते है कि ये दोस्ती आबाद रहें।
