
डॉ कल्पना सिंह, सिलीगुड़ी
हुई रात काली, अरे ओ मुरारी,
धरा पर तुम आकर ज्ञान का दीप जला दो।
फैला है यहाँ अराजकता का अंधकार,
लिपटा है व्याल-सा अपराधों का संसार।
दुश्शासन-से लोग डगर-डगर घूम रहे हैं,
चौक-चौराहों पर स्मिता लुट रही है।
नाते-रिश्ते सब तार-तार हो गए,
प्रेम-प्यार का रिश्ता अब व्यापार बन गया।
कर्महीन सभी बने बैठे हैं भाग्यविधाता।
आओ, हे योगेश्वर!
ज्ञान का दीप जला दो।
निष्छल हो जाए मन, भस्म हो जाए कुबुद्धि,
मिट जाएँ सब क्लेश, धरा निर्मल हो जाए।
फूटे पाप का घड़ा, महमहाकर उठे धरती।
मधुर मुरली बजाकर प्रेम-रस बरसा दो।
मिट जाएँ सब संताप,
तृप्त हो जाए यह धरती।
एक बार फिर झूम उठे
नंदन-कानन-सी यह सृष्टि।।
लेखिका के बारे में
डॉ. कल्पना सिंह
समकालीन हिंदी साहित्य की एक संवेदनशील, विचारशील और सृजनधर्मी लेखिका हैं। उनका जन्म 14 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक एवं साहित्यिक नगर प्रयागराज (पूर्व नाम इलाहाबाद) में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय श्री संग्राम सिंह तथा माता स्वर्गीय श्रीमती शारदा सिंह से प्राप्त संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व और लेखन को गहरी मानवीय संवेदनाओं से समृद्ध किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए., पीएच.डी. तथा बी.एड. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वर्तमान में उनकी कर्मभूमि सिलीगुड़ी है, जहाँ वे अध्यापन के साथ-साथ इग्नू (IGNOU) में काउंसलर के रूप में भी अपनी सेवाएँ दे रही हैं।
अध्ययन, अध्यापन, लेखन और पर्यटन उनकी प्रमुख रुचियाँ हैं। शोधपरक दृष्टि, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाएँ उनके लेखन की विशेष पहचान हैं।
उनकी रचनाएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं—स्वाधीनता, नया परिदृश्य, प्रज्ञान विश्वम्, काव्य प्रहर आदि तथा विश्वामित्र जैसे समाचार पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। कविता, लघुकथा, लेख और समीक्षा जैसी विविध विधाओं में उनकी सशक्त उपस्थिति रही है। उनकी कविताएँ ‘स्वर्ण मृगी’, ‘सपनों की पाखी’, ‘शब्द समंदर’ और ‘माटी की महक’ जैसे साझा काव्य-संग्रहों में भी प्रकाशित हैं।
डॉ. कल्पना सिंह का लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी गहन संवेदना और सकारात्मक दृष्टि का सृजनात्मक विस्तार है। उनकी रचनाएँ पाठकों को आत्ममंथन, आशा और जीवन के उजले पक्ष की ओर प्रेरित करती हैं।
