‘असली और आख़िरी सज़ा’

सांझ के धुंधले आकाश के नीचे एक सूखे पेड़ के पास बैठा अकेला व्यक्ति और उसकी शाखाओं पर बैठे खामोश परिंदे, जो खोए हुए सपनों और भीतर की पीड़ा का प्रतीक हैं।

प्रो.डॉ.मनु, प्रोफेसर (हिन्दी) केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय

एक वक़्त था,
जब मेरे अंदर
परिंदे बसते रहते थे—
बेचैन, शोर करते हुए,
आसमान की तलाश में।

मगर मैंने
हर उड़ान से
समझौता कर लिया।

अब वे परिंदे
सूखे दरख्तों पर बैठे
मेरी तरफ़ देखते हैं,
जैसे किसी कैदी को
उसकी पुरानी आज़ादी
याद दिला रहे हों।

अब वे न फड़फड़ाते हैं,
न चीखते हैं;
बस उनकी पथराई हुई
आँखों का सन्नाटा
मेरे दिल को कुरेदता है।

उनकी आँखों में
जो शिकायत थी,
वह अब एक
सर्द खामोशी बन चुकी है।

और किसी की
खामोशी को सहना ही
मेरी असली और
आख़िरी सज़ा है।

9 thoughts on “‘असली और आख़िरी सज़ा’

  1. पढ़ते हुए लगा जैसे यह सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, उन सबकी कहानी है जिन्होंने किसी मोड़ पर अपने सपनों से समझौता किया हो। आख़िरी पंक्तियाँ विशेष रूप से मन में उतर गईं।

    1. दूसरों की खामोशी के दर्द को सहते हुए आप खुद को सजा देते हो। समाज में कुछ आतातायी किस्म के लोग होते हैं जिनकी आत्मा मर चुकी है। वे मांस के लोथड़े (आतातायी) खुद तो सड़ सड़ कर मरते हैं और आप जैसे सह्रदय कवियों को दर्द सहने के लिए…
      ‘दिनकर जी’ की तरह दहाड़ मारनी ही पड़ेगी। तब ही इन निष्ठुरों से मुक्ति मिल सकेगी।

  2. हर शब्द दिल को छू गया, समझौते इंसान को ज़िंदा तो रखते हैं, मगर भीतर के परिंदों की उड़ान छीन लेते हैं। अद्भुत अभिव्यक्ति👌❤️

  3. दूसरों की खामोशी के दर्द को सहते हुए आप खुद को सजा देते हो। समाज में कुछ आतातायी किस्म के लोग होते हैं जिनकी आत्मा मर चुकी है। वे मांस के लोथड़े (आतातायी) खुद तो सड़ सड़ कर मरते हैं और आप जैसे सह्रदय कवियों को दर्द सहने के लिए…
    ‘दिनकर जी’ की तरह दहाड़ मारनी ही पड़ेगी। तब ही इन निष्ठुरों से मुक्ति मिल सकेगी।

  4. दूसरों की खामोशी के दर्द को सहते हुए आप खुद को सजा देते हो। समाज में कुछ आतातायी किस्म के लोग होते हैं जिनकी आत्मा मर चुकी है। वे मांस के लोथड़े (आतातायी) खुद तो सड़ सड़ कर मरते हैं और आप जैसे सह्रदय कवियों को दर्द सहने के लिए…
    ‘दिनकर जी’ की तरह दहाड़ मारनी ही पड़ेगी। तब ही इन निष्ठुरों से मुक्ति मिल सकेगी।

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