‘असली और आख़िरी सज़ा’
कभी हमारे भीतर भी परिंदे बसते हैं—सपनों, इच्छाओं और उड़ानों के रूप में। लेकिन जब हम समझौतों के कारण उन्हें कैद कर देते हैं, तब उनकी खामोशी ही हमारी सबसे बड़ी और आख़िरी सज़ा बन जाती है।

कभी हमारे भीतर भी परिंदे बसते हैं—सपनों, इच्छाओं और उड़ानों के रूप में। लेकिन जब हम समझौतों के कारण उन्हें कैद कर देते हैं, तब उनकी खामोशी ही हमारी सबसे बड़ी और आख़िरी सज़ा बन जाती है।