
प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तर प्रदेश)
ये जो इश्क में वफ़ा के
रंग बिखरते हैं हम,
देखो, इसका प्रमाण देने
एक और सोनम बनकर
सिया खड़ी हो गई।
नाम ‘सिया’ और कृत्य निर्लज्ज,
एक और माँ की ममता
क्षत-विक्षत हो गई।
धूमिल कर रही हैं
माँ-बाप की छवि ये बेटियाँ।
मुस्कान, सोनम और सिया बनकर,
एक माँ की गोद सूनी कर,
आँसुओं की उपज बन गई हैं ये बेटियाँ।
एक ओर सीमा पर, सिंदूर की खातिर
लड़ जाती हैं ये बेटियाँ,
विडंबना है इस रोगी मानसिकता की
सिंदूर को ही काल का ग्रास
बनाती हैं ये बेटियाँ।
हर बार केवल तृषा ही शिकार नहीं होती,
कभी केतन, रघुवंशी और सौरभ की
ज़िंदगी भी बेजार होती है।
माँग सिंदूर से सुर्ख नहीं,
हाथ रक्त-रंजित हैं।
बुझाकर किसी घर का दीपक,
आज चर्चाओं में चर्चित हैं।
संवेदनाओं पर चला है चाबुक,
मानवता तार-तार है।
नहीं बचा अब मोल निबाह का,
फरेब का आडंबर ही
आज गतिमान है।
