
दोलन रॉय, संभाजीनगर (महाराष्ट्र)
वह कालखंडों का इतिहास पढ़ता,
धीरे-धीरे वर्तमान की ओर बढ़ता।
विचारों की जड़ता में जकड़ा संसार,
जहाँ सब कुछ एक दिन सड़ता है।
कुछ नया चाहिए—
नया धर्म,
नया विचार,
नया मन।
पूर्वाग्रहों से रिक्त,
संवेदनाएँ न हों तिक्त।
सब कुछ नया, शिशु-सा सुंदर,
निर्मल, निष्कलुष और प्रखर।
इस दूषित यथार्थ से तो बेहतर हैं
वे काल्पनिक कहानियाँ,
जहाँ सत्य की विजय होती थी,
और नैतिकता पराजित नहीं होती थी।

सुंदर अभिव्यक्ति 👌