
भगवती सक्सेना गौड़, बेंगलूरु
चिंतन और आत्ममंथन करते रहे,
जन्म से ही प्रतिस्पर्धा का युग था।
समाज की आवाज़ सुनते रहे
“रंग कैसा है?”
जन्मदात्री लोगों को समझाती रह गई।
ईश्वर ने दिमाग ठीक-ठाक दिया,
स्नातक के बाद विवाह की बारी आई।
शादी का पैमाना तो गोरी लड़की थी,
चाय पर सूरत देखी जाती थी, सीरत नहीं।
ए प्लस बी होल स्क्वायर की जगह
जे प्लस बी होल स्क्वायर काम आया।
अलजेब्रा के इक्वेशन समझते-समझाते
मनपसंद साथी पा लिया, खुश हुए।
फिर आया बच्चों की प्रतिस्पर्धा का युग,
वे हमसे कई कदम आगे बढ़ते रहे।
आकाश में उड़ने की राह पकड़ ली,
स्वयं के अवलोकन में एकांत भाने लगा।
फिर लेखनी ने स्वयं हाथ पकड़ लिया,
राह दिखाकर भावनाओं को जगाया।
कहानी और कविता ने रातों को जगाया,
और हम जीवन भर कर्म करते रहे।
धर्म और दान की प्रतिस्पर्धा में नहीं पड़े,
बस अपने कर्तव्य निभाते रहे।
अब ईश्वर की बोर्ड परीक्षा का इंतज़ार है,
पता नहीं स्वर्ग मिलेगा या नरक।

बहुत ख़ूब ✍🏻अच्छी रचना है।
nice