रिश्तों की डोर

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स्वरा सुरेखा अग्रवाल (उत्तरप्रदेश)

रिश्तों की डोर दोनों ओर से मजबूत होनी चाहिए। जितने ज़्यादा रिश्ते, उतनी डोर झुकेगी। रिश्तों की गति मद्धम होनी चाहिए, फास्ट नहीं, ज़रा स्लो रखिए। गर्माहट की तपिश स्निग्ध हो, पकड़ कोज़ी हो, चाशनी कम और कड़वाहट मनमोहक—यानी संतुलन ज़रूरी है।

बांधिए भी उतना कि घुटन न हो, पकड़िए भी नरमी से, कि जब हाथ छूटे तो खरोंच न आए। लहूलुहान रिश्ते ठीक होते हैं, पर पपड़ी एक निशान छोड़ देती है, और बरबस निगाहें उस दाग में उलझ कई प्रश्नचिह्न छोड़ देती हैं।

अप्रत्याशित सवालों के जवाब नहीं मिलते तब बस उंगली अगले की तरफ उठती है, और बाकी चार अपनी तरफ, जो घातक हैं।

मसले बड़े हों या छोटे, आपसी बातों से समझदारी से सुलझाए जाते हैं। पहले सुनने की आदत डालें, गौर से सुनें, फिर अपनी राय दें। होता क्या है कि जब हम तैश में होते हैं, तो ज़ेहन में सिर्फ और सिर्फ नकारात्मकता ही विराजमान होती है। ज़ाहिर सी बात है और सर्वविदित है कि आक्रोश और नकारात्मक सोच का अंत अक्सर अफसोसजनक ही होता है।

गुस्से में हों या गलतफहमी में, थोड़ा रुकें। समय दें खुद को और दूसरे को, तब आगे निर्णय लें। आवेश में कोई निर्णय न लें और न ही संवाद करें, क्योंकि गुस्से से निकले शब्द अभद्र और विषाक्त होते हैं।

कहते हैं कि शब्दों के बाण हृदय भेदते हैं, तो बोलने से पहले रुकें, क्योंकि एक क्षण की असहनशीलता आपके बरसों के बंधे रिश्ते पलभर में खत्म कर देती है।

माँ कहती हैं, इंसान वाणी से ही नज़रों में उतरता है और वाणी से नज़रों से उतर भी जाता है।

और यह तब और ज़रूरी हो जाता है जब हम कलम हाथ में थामे होते हैं। यदि शब्दसारथी हैं, तो कलम भी शालीन, सौम्य और मार्गदर्शक होनी चाहिए।

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