
सविता सिंह ‘मीरा’ जमशेदपुर
कदाचित् ऐसा अनुभव होता है
कि कहीं कोई ऐसा हो,
जिसके समक्ष
अंतःकरण की समस्त बातें
निर्विघ्न उँडेल सकूँ।
वह कोई भी हो
पर इतना आत्मीय हो,
कि प्रत्येक शब्द को
अपने अंतर में संजो ले,
और किंचित् भी आहट
जगत् तक न पहुँचे।
यदि सम्मुख आत्मीयता का स्पर्श न मिले,
तो श्रेयस्कर है मौन धारण करना,
हर किसी हेतु हृदय-पुस्तक का
एक पृष्ठ भी उद्घाटित न करना।
पर जो वास्तव में अपना प्रतीत हो
उसके समक्ष
अंतर्मन को निर्भय उँडेल देना,
स्वयं को एक खुला ग्रंथ बना देना
जहाँ प्रत्येक शब्द
विश्वास में अभिसिंचित हो।
क्योंकि प्रत्येक कर्ण
श्रवण के योग्य नहीं होता,
और प्रत्येक हृदय
गूढ़ रहस्यों का धारक नहीं होता।
आवश्यक है केवल एक ऐसा आश्रय
जहाँ मन हल्का हो जाए,
और विश्वास अविचल रहकर
मौन ही मुस्कुरा उठे।
और तब
जब समस्त जगत् अपरिचित-सा प्रतीत हो,
जब शब्द भी संकोच से भर जाएँ
एक सत्य निस्संदेह उभरता है
कि इस विश्व में
यदि कोई एकमात्र विश्वसनीय,
निःशब्द रहस्य-संरक्षक है
तो वह है
केवल एक पुस्तक।
मेरे “मन की कही” को
जो गुल्लक मे अभिसिंचित करे।

सविता जी की मन की कहीं…एक सुंदर रचना