
डॉ. अनामिका दुबे निधि, मुंबई
थोड़े से चारे का लालच पाकर भोली गाय,
ऊँचे मंचों पर चढ़कर भेड़िये के गुण गाए।
हाय… क्या हो रहा है…
मिलो न सच से तो हम घबराएँ,
मिलें तो आँख चुराएँ—
हाय… क्या हो रहा है…
कल तक जो शब्दों में अंगार सजाया करती थीं,
हर झूठ के चेहरे से नक़ाब हटाया करती थीं,
आज वही हर बात पर मुस्कान सजाए बैठीं,
झूठे किरदारों में सच को दबाए बैठीं।
हाय… क्या हो रहा है…
मिलो न सच से तो हम घबराएँ,
मिलें तो आँख चुराएँ…
थोड़ी सी वाह-वाह क्या मिली, सब कुछ बदल गया,
कलम का रास्ता भी जाने किधर निकल गया।
जो खुद को आईना कहती थीं ज़माने भर का,
आज वही आईने से रिश्ता ही टल गया।
हाय… क्या हो रहा है…
मिलो न सच से तो हम घबराएँ,
मिलें तो आँख चुराएँ…
मंचों की रोशनी में सच यूँ धुंधला जाता है,
चेहरे तो चमकते हैं, किरदार जल जाता है।
शब्दों की सौगंध जो खाई थी कभी दिल से,
वही वादा अब भीड़ में खो सा जाता है।
हाय… क्या हो रहा है…
मिलो न सच से तो हम घबराएँ,
मिलें तो आँख चुराएँ…
काग़ज़ पर क्रांति लिखी, मंच पर समझौता है,
ये दौर अजीब है, हर शख्स ही छोटा है।
जो बोल दे सच, उसको ही खामोश किया जाए,
जो झुक के जी ले, वही आज का मोटा है।
हाय… क्या हो रहा है…
मिलो न सच से तो हम घबराएँ,
मिलें तो आँख चुराएँ…
हमने तो कलम को कभी झुकना सिखाया ही नहीं,
सच के सिवा लफ़्ज़ों को कहीं और सजाया ही नहीं।
जो बिक गए मंचों पर, वो हमसे नज़र क्या मिलाएँगे,
हमने तो खुद को कभी दामों में लगाया ही नहीं।
