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मंच की चमक के पीछे छिपा सच और अकेला खड़ा एक लेखक

“हाय… क्या हो रहा है…

यह कविता समाज के उस बदलते चेहरे को उजागर करती है जहाँ सच बोलने वाले खामोश कर दिए जाते हैं और मंचों पर समझौते बिकते हैं। यह कलम की ईमानदारी और दिखावे की दुनिया के बीच का तीखा टकराव है।

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