
मिन्नी मिश्रा, पटना
“कौ…न? अरे! रुको, जबरदस्ती अंदर क्यों घुस रहे हो? मेरी आँखें चुंधियाने लगी हैं।”
“मैं….प्रकाश।” आगंतुक ने उत्तर दिया।
“कौन .. प्रकाश? मैं तुझे नहीं जानता। भाग यहाँ से।”
“वाह! अजीब है। प्रकाश से ही संपूर्ण जगत चलता है, और इसे देखो, मुझे कमरे में घुसने से मना कर रहा है। हे भगवान! यहाँ हाथ का हाथ नहीं सूझता।” विरोध होने के बावजूद प्रकाश तेज़ी से कमरे में प्रवेश कर गया।
“मुझे इसी तरह रहना अच्छा लगता है। बहस मत कर,चल, निकल बाहर। ” अंधेरे ने उसे धमकाते हुए कहा।
“अरे…या…र, समझा कर। आँखें उजाले में ही काम करती हैं, अंधेरे में नहीं।”
“सुनो, उजाले से मुझे कोई लेना-देना नहीं है। मुझे सब पता है कि घर में कहाँ क्या है, समझे? अभी यहाँ से दफ़ा हो जाओ।” अँधेरा उबल पड़ा।
फिर भी प्रकाश कमरे में बेख़ौफ़ आगे बढ़ता गया। अंदर का नज़ारा देख वह भौंचक रह गया। कहीं लूट-खसोट का माल, कहीं शराब की बोतलों का अंबार…तो एक कोने में महिलाओं की आबरू की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं! क्रोधाग्नि में जलते हुए प्रकाश ने अपना विराट स्वरूप दिखाया।
लेकिन अँधेरे को बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि कोई उसके घर में घुसकर दादागिरी करे। तमतमाते हुए वह प्रकाश को पीछे धकेलने लगा। लेकिन उसे भगा नहीं सका। आखिरकार अँधेरा लड़खड़ाकर धड़ाम से गिर पड़ा और ज़ोर से चिल्लाया, “बचाओ …ओ….., बचा…ओ..”
“क्या हुआ…?” प्रकाश ने उसे उठाते हुए मुस्कुरा कर पूछा।
“कमरे में बहुत घुटन क्यों महसूस होने लगी है? अचानक मुझे इन औरतों के चेहरों पर असहनीय पीड़ा क्यों दिख रही है? मेरा दिल बहुत ज़ोर से क्यों धड़क रहा है?” अपने प्रश्नों से घिरा हुआ अँधेरा बेतहाशा सड़क की ओर भागा।
