
अर्पणा सिंह अर्पी , रांची
आनंद कमरे में बैठा सपनों की दुनिया में खोया था। अतीत की घटनाएँ चलचित्र की भाँति चल रही थीं समय से पहले पत्नी को खो देना और बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाना। सबके कहने के बावजूद उसने दूसरी शादी न करने का निर्णय लिया था।इन सभी उलझनों में वह उलझा हुआ था कि तभी कानों में पिघलते शीशे की तरह छोटे बेटे की आवाज़ पड़ी.“खाना खा लें… कोई आपके लिए बैठा नहीं रहेगा, ना ही आवाज़ देगा।”आनंद को लगा जैसे उसका सब कुछ बिखर गया हो। सारे सपने चकनाचूर हो गए। क्या इन्हीं शब्दों को सुनने के लिए उसने दूसरी शादी नहीं की थी? वह घर और बाहर दोनों को सँभालता रहा।
उसका मन लहूलुहान हो गया। उसने सोचा था कि बहू आएगी तो बुढ़ापे में सुकून की रोटी नसीब होगी, पर हाय रे क़िस्मत ऐसी रोटी मिली जो हलक के नीचे उतरना भी मुश्किल हो गया।उसी क्षण बहू थाली में सब्ज़ी के साथ दो रोटियाँ रखकर सामने रख गई। आनंद की आँखों से अश्रुधार बह निकली, जो रोटियों को भिगो गई। अपलक रोटियों को देखते हुए वह सोचने लगा-माँ के रहते जिन रोटियों की कभी क़द्र न की थी, आज वही जीने के लिए कितनी अनमोल हो गई हैं।
