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सैनिक का अंतर्मन

भारतीय सैनिक की वर्दी में खड़ा जवान, पृष्ठभूमि में तिरंगा और भावनात्मक माहौल

गौसिया परवीन, बिजनौर

पत्नी से…

ऐ प्रिय! तुम रोना नहीं,
आऊँगा न मैं लौटकर कभी—
यह विश्वास खोना नहीं।

तुम एक सुहागन रहो,
श्रृंगार तुम्हारा ही सजा रहे,
मेरा एक यही दायित्व है—
तुम यह अभिमान “संजोना” नहीं।

पूरा करूँगा मैं वह वादा
जो मैंने किया था,
यह वादा सिर्फ तुमसे नहीं,
इस देश से भी किया था।

आज वह वक्त आया है,
जब मैंने अपना वादा निभाया है।
मिलेंगे बहुत जल्द हम—
इस लोक में न सही, उस लोक में सही।

तुम हौसला हो मेरा,
तुम यह खोना नहीं—
ऐ प्रिय! तुम रोना नहीं।।

बहन से…

एक बहना तू है मेरी,
हर राखी पर करती इंतज़ार है।
मिलने को तुझसे
यह भाई भी
बेकरार है।

मगर,
तेरी तरह इस देश की हर बहन
मुझसे करती बहुत प्यार है।
यह भाई करेगा रक्षा
उनके भाई, पिता और सुहागों की—
उनका भी यह विश्वास है।

तोड़ दूँ कैसे उनकी उम्मीदें,
जो मेरे ही अंदर की आवाज़ है।

आएगा एक दिन तेरे पास भी
करने पूरी आस तेरी—
चाहे यह शरीर न हो,
हो आत्मा मेरी।

पिता से…

चाहा था कितना तुमने,
कितना दुलार दिया—
अब इस दुलार की फिर से चाहत है।

आ रहा हूँ पास तुम्हारे,
दुलार लुटाना तुम,
बचपन के जैसे फिर
सीने से लगाना तुम।

कि वक्त नज़दीक है मेरा—
यह वक्त की अलामत है।

इंतज़ार था तुम्हें,
“बेटा मेरा आएगा,
इस बूढ़ी ज़िंदगी को
खुशियों से भर जाएगा।”

मगर यह खुशियाँ
अधूरी रह जाएँगी,
जब तुम्हारा जिगर का टुकड़ा
सफ़ेद लिबास में लपेटा जाएगा।

आऊँगा जब मैं कफ़न में लिपटकर,
मुझे ऐसे देखकर
तुम रोना नहीं।

काँपेंगे हाथ तुम्हारे,
फिर भी संयम खोना नहीं।
धैर्य जो सिखाया था मुझे,
अब तुम खुद वह खोना नहीं।

मिल जाए गर एक जीवन और,
तुम्हारे बूढ़े कंधों का सहारा बन जाऊँ,
जब धुंधला जाए तुम्हारी आँखें,
उनकी रोशनी बन जाऊँ।

बस यह ख़्वाहिश है—
अगले जन्म भी मैं
तुम्हारा बेटा बनकर आऊँ।।

माँ से…

तेरी पलकों की छाँव में
मैं हँसा, खुश हुआ और बड़ा हुआ।
तेरे आँचल में छुपकर
हर दुख भूल गया।

कभी सोचा न था मैंने
तुझे दुखी कर जाऊँगा,
जिन आँखों में देखी ममता,
जिस चेहरे पर मुस्कान रही—
उन आँखों को आज
मैं ही सूना छोड़ जाऊँगा।

लाल नहीं मैं सिर्फ तेरा,
इस भारत माँ का भी मैं सपूत हूँ।
तू गर्व करना सदा मुझ पर—
कि तू एक रक्षक की माई है,
जिसने अपनी जान
अपने देश के लिए दाँव पर लगाई है।

याद जब तुझे कभी मेरी सताएगी,
तो देख लेना एक नज़र
इस देश के जवानों को—
तुझे इस देश के हर बेटे में
अपने लाल की परछाई नज़र आएगी।

क्योंकि तूने उस बेटे को जना है,
जिसके मरने के बाद भी
सबके दिलों में एक अमिट छाप रह जाएगी।

पता नहीं अब कितनी साँसें बाकी हैं,
जितनी बची हैं बस
उन्हें तेरी गोद में बिताना चाहता हूँ।

अगले जन्म यदि जन्म मिला,
तो तेरा ही बेटा बनना चाहता हूँ।

बहुत वक्त हुआ जागते हुए,
अब थक गया हूँ मैं—
कुछ पल दे दे सुकून के
अपने आँचल में,
कि अब आराम से सोने चला हूँ मैं।।

लेखिका के बारे में

गौसिया परवीन
समकालीन युवा लेखन की एक उभरती हुई सशक्त और बहुआयामी प्रतिभा हैं। 3 जुलाई 1998 को जन्मी गौसिया ने शिक्षा के साथ-साथ साहित्यिक अभिव्यक्ति में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। एम.ए. (राजनीति विज्ञान) के साथ बी.एड. और एम.एड. की पढ़ाई करते हुए उन्होंने ज्ञान और संवेदना का संतुलन साधा है। उनकी कविताएँ सामाजिक भावनाओं और जनसरोकारों को सहज और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं। पब्लिक इमोशन न्यूज़पेपर, आकाशवाणी नजीबाबाद और रेडियो संदेश 89.6 जैसे मंचों पर उनकी रचनाएँ प्रसारित हो चुकी हैं। “मोहब्बत हो ही जाती है” जैसे उपन्यास के माध्यम से उन्होंने कथा लेखन में भी अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया है।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा उनके निबंधों का चयन उनके लेखन की गुणवत्ता को दर्शाता है।विभिन्न शैक्षणिक और साहित्यिक मंचों पर पुरस्कार और सम्मान प्राप्त कर उन्होंने अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया है। साहित्य, शिक्षा और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें एक संवेदनशील और जागरूक रचनाकार बनाती है।
गौसिया परवीन निरंतर अपने शब्दों के माध्यम से नई पीढ़ी की सोच और भावनाओं को सशक्त आवाज दे रही हैं।

3 thoughts on “सैनिक का अंतर्मन

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। शब्दों के रूप में!👌👌

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