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बढ़े जा रहे हो किस ओर

अपनी राह पर अकेले खड़ा व्यक्ति, जो समाज की परवाह किए बिना आगे बढ़ रहा है

अलका ओझा, लेखिका, मुंबई

बढ़े जा रहे हो किस ओर
कि शायद मुझे ख़ुद पता नहीं।
कदम ये बढ़ रहे हैं केवल इसी उम्मीद में
कि जिधर जाएंगे, सही जाएंगे।

सपनों का पता है और अपनों का भी पता है,
जब भी ये कदम जागे और जिस तरफ़ गए हैं,
हर बार ही सही तरफ़ गए हैं।
तो बढ़ रहे कदम हैं, सही तरफ़ जाएंगे।

ये जो राहें हैं, थोड़ी मुश्किल ज़रूर लग रही हैं,
पर लगे रहें तो ये राहें भी पार हो जाएंगी।

पहुंचना सभी को है मंज़िल तक,
पर देर तक चलने से घबरा जाते हैं।
पहुंचते वही हैं मंज़िल तक,
जिनके हौसलों में बड़ी उड़ान होती है।

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