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 युगान्तर

दहलीज़ पर खड़ी महिला और दूर जाता प्रेम का प्रतीकात्मक दृश्य आसान नहीं था तब -

कृष्णा हरीश तिवारी, नागदा जंक्शन (मध्यप्रदेश)

आसान नहीं था तब,
आज की तरह
हस्ताक्षर करना
जीवन के उपन्यास पर।

मानो चूल पर था चलना,
फिर भी उसे सच बताना था,
मुझे सच छुपाना था।

वो पूर्ण प्रेम-ग्रंथ
और मैं पाँच कोस की
बदलती बोली।

जीवन के कोरे कागज़ पर
उसने लिखी मनमर्ज़ियाँ,
मैंने लिखीं बंदिशें।

न कागज़ मेरा, न स्याही,
बस एक उड़ान थी अनाम।
यक़ीन के साहिल पर
बैठा रहा वो,
मैं वक़्त की नज़ाकत में
बहती चली गई।

चक्रव्यूह की सलाखें
तोड़ी उसने,
और मैं सही-गलत के
भँवर में घिरती चली गई।

उसके लिए कम थे,
मगर मेरे लिए बहुत थे
फ़ासले और फ़ैसले…
कभी वक़्त के,
कभी दहलीज़ के।

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