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“आसान हो जाए सफ़र”

मेरी क़िस्मत में तेरा साथ अगर हो जाए

ज़िंदग़ी का मेरा आसान सफ़र हो जाए

और कुछ भी नहीं ख़्वाहिश मेरी अब इसके सिवा

मेरे महबूब की बस मुझ पे नज़र हो जाए
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वक़्त ए फ़ुर्सत मन मेरे चल ढूंढ लें चल कर कहीं

हांफ़ती इस ज़िंदगी को चैन दो पल का तो हो
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आप आएंगे ये सुन कर आप में गुम हो गए

गीत नग़मे सब मिरे मौज ए तरन्नुम हो गए

अश्क दामन से निकल कर छा गए हैं ‌हर तरफ़

ना-उमीदी के दिये भी माह ओ अंजुम हो गए
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अपने हाथों से जवानी की कहानी लिख गया

जो वतन के नाम अपनी ज़िन्दगानी लिख गया

घर में जिसका रास्ता माँ देखती है रात दिन

वो जवां तो देश की ख़ातिर जवानी लिख गया

प्रसिद्ध कवयित्री व शायरा मोनिका मंतशा
देहरादून, उत्तराकाशी

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