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अंधेरे …

नमिता गुप्ता ‘श्री’ प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ (उ.प्र.)

ये अंधेरे डराते मुझे घेरकर,
नहीं जाएंगे हम तुम्हें छोड़कर।

कि मायूस है तल्ख़ियों से तिरी,
लगा लो गले से उसे दौड़कर।

हम रहेंगे सभी साथ परिवार के,
सभी को रखो प्यार से जोड़कर।

सभी के लिए काम आते रहे,
मेरे वक़्त पर सब गए छोड़कर।

सितारे चमकने लगे प्यार के,
बिछा दूँ मैं चाहत के गुल तोड़कर।

सुनो, ज़िंदगी ने सबक जो दिए,
कभी भूल सकती नहीं उम्रभर।

तिरे बिन अकेली न जी पाऊँगी,
सदा साथ रहना तू मेरी नज़र।

सदा ज़ख्म खाते निखरते रहे,
चमकते रहे हम सफ़र दर सफ़र।

2 thoughts on “अंधेरे …”

  1. आखिरी पंक्तियां… चमकते रहें हम सफर…
    बढ़िया।

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