gulmohar

आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।

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