बचपन

बचपन के वे सुनहरे दिन छोटी-छोटी खुशियों से भरे थे काग़ज़ की कश्तियाँ, बरसात की लहरें और मासूम शरारतें। पर समय बदल गया; तकनीक और प्रतिस्पर्धा ने सरल मनों पर बोझ डाल दिया। जहाँ बच्चों को खुलकर उड़ना चाहिए था, वहीं आज उनके आस-पास चिंता, दबाव और अनचाही समझदारी के पहरे खड़े हैं। फिर भी आशा यही है कि बचपन अपने स्वच्छंद पंखों से उड़ान भरे और माता-पिता का मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा दे।

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