खरीद-दार
एक ऐसा समाज जहाँ खरीदार को इज़्ज़त और बेचने वाले को बदनामी मिलती है, वहाँ यह रचना हमारे नैतिक ढांचे पर गहरा सवाल उठाती है। क्यों केवल बेचने वाले को अपमान सहना पड़ता है, जबकि ऊँचे ओहदों पर बैठे लोग—जो रातें रंगीन करते हैं—बेखौफ़ और बेदाग़ रह जाते हैं? यह कविता उस कड़वे सच को उजागर करती है कि कई बार एक स्त्री अपने बच्चे की परवरिश के लिए खुद को बेचने को मजबूर होती है — शायद उस आदमी के बच्चे के लिए, जो पैसे देकर इज़्ज़त खरीद कर चला गया। यह सवाल उठाती है कि नामचीन और शक्तिशाली लोग, जो सब जानते हैं, आखिर मौन क्यों हैं?
