त्याग, संघर्ष और चिरनिद्रा
पिताजी चौबीसों घंटे की चौकीदारी करते रहे। दिन-रात की दोहरी ड्यूटी, बस कुछ घंटों की अधूरी नींद और एक छोटे से केबिन में सिमटी ज़िंदगी—यही उनका संसार था। मैंने जब जाना कि बाबूजी महीनों तक मुश्किल से दो-तीन घंटे ही सो पाते हैं, तो मेरा दिल काँप उठा। इतना बड़ा त्याग उन्होंने सिर्फ़ इसीलिए किया कि मैं पढ़-लिख सकूँ और परिवार संभल सके। उनके संघर्ष को याद कर आज भी लगता है—किसी इंसान की मजबूती और प्यार का सबसे सच्चा रूप शायद पिता ही होते हैं।
