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ये रेशमी जुल्फें

गाँव की गलियों में आजकल एक नई आवाज़ गूंजने लगी है. “माथा का बाल ले लो… पाँच हज़ार रुपए किलो!” पहली बार सुनने पर यह बात उतनी ही लुभावनी लगती है जितनी किसी मेले में सोने के दाम में चाँदी बेचने की। लेकिन सच्चाई कुछ और है .यह नया “धंधा” ग्रामीण महिलाओं की भोली मानसिकता और शहरी उद्योगों की चालाकी का संगम है।
गिरते बाल अब चिंता का नहीं, कमाई का विषय बन गए हैं। महिलाएँ इन्हें संभालकर रखती हैं, ताकि अगले महीने फेरीवाले से कुछ रुपये या सस्ता सामान पा सकें। पर असल में वे जिस चीज़ का सौदा कर रही हैं, वह उनका सौंदर्य और समझ दोनों हैं।ये बाल आगे चलकर विग, कॉस्मेटिक और विदेशी बाजारों में करोड़ों की कीमत पा जाते हैं।
सवाल यही है क्या हम सच में “बालों को बचा रहे हैं” या “अपनी समझ खो रहे हैं”?

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