बगुलाभगत

तुमने मित्रता का हाथ बढ़ाया और मैंने उसे सच्चे मन से स्वीकार भी किया। यह अनुभव मुझे एक नई ख दे गया – कि हर नए मित्र को परखकर ही अपनाना चाहिए। तुम्हें यह भ्रम रहा कि तुम्हारी मित्रता मुझे जीवन भर अभिमान देगी, लेकिन धीरे-धीरे मैं समझने लगी कि मित्रता में स्वार्थ छिपा होता है और उसका सत्य अक्सर कटु होता है।
तुम्हारी खट्टी-मीठी बातें, दिखावे की आवभगत और गरिमामयी उपस्थिति मुझे किसी बगुला भगत से कम नहीं लगी। मेरी बेरंग जिंदगी में रंग भरने की तुम्हारी कोशिश झूठी थी, और प्रेम प्रसंगों की ठिठोली मेरी आस्था को भीतर ही भीतर जला रही थी। तुम्हारी झूठी तारीफें, बनावटी शानोशौकत और ऊँची-ऊँची बातें मेरी अस्मिता पर आघात कर रही थीं। मेरे कंधे तुम्हारे सपनों का बोझ ढोते रहे, और तुम्हारी प्रसिद्धि की लालसा मेरी आहुति को प्रश्नांकित करती रही। तब मैंने जाना कि तुम्हारी मित्रता सच में कफन जैसी सफेद और मौत जैसी ठंडी है।

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भंँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कुंँवर….

मेरे जीवन की वाड़ी, जिसे मैंने प्रेम और समर्पण से सींचा, फूलों-सी महकी और पत्तों-सी निखरी। भौंरे उसकी मिठास में आकर्षित होकर अपने हिस्से का रस ले गए। मैंने जिन लोगों को अपना मानकर आगे बढ़ने का हिस्सा बनाया, उनका साथ भी किसी उद्देश्य से था—पर वे सगे नहीं थे, और समय ने उनके असली चेहरे दिखा दिए। उनकी ज़रूरतें और इच्छाएँ अधिक थीं, और जब तक मैं काम आता, वही काफी था। फिर भी, हौसलों को बुलंद रखकर, नेक काम करके, आगे बढ़ जाना ही सही राह है।

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