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कुछ मनकही

कभी-कभी ज़बान से निकले जुमले इतने तेज़ और धारदार होते हैं जैसे कमान से छूटा हुआ तीर।
जिसका ज़िक्र दिल की धड़कनों में रच-बस जाए, उसे भला जान से कैसे जुदा किया जा सकता है?
पर सच यह है कि कुछ बातों में दम नहीं होता।
लोग अपने ही बयान से हल्के और खोखले साबित हो जाते हैं। कभी ऐसा भी हुआ कि किसी ने मुझे देख लिया और छिप गया, जैसे मैं ही उसके सामने आईना हूँ। उस पल महसूस हुआ कि मकान से बाहर निकलते ही इंसान अपने असली रूप में आ जाता है।

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छप्पन वर्ष

“पचपन नहीं… छप्पन बरस हो गए हमारी शादी को।”वृद्धा ने हँसते हुए कहा, और वृद्ध भी मुस्करा दिए। सुबह से ही फोन की ट्रिन-ट्रिन ने उन्हें परेशान किया था, पर अब समझ आया. यह बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ें थीं।
यादों की परतें खुलीं—इलाहाबाद के दिन, बच्चों की हंसी, कंधों पर बैठा कर दिखाई गई चौकी, रजाई के भीतर की मूँगफली… और आज वही बच्चे हिसाब मांगते हैं, शिकायतें करते हैं। पर इस सुबह आदित्य के गुलदस्ते और अर्चना की हंसी नेवृद्ध दंपति की आँखों को बारिश की बूँदों-सा चमका दिया।

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