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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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