धूप आती है….

सांझ ढलते ही मन बोझिल हो उठता है। लौटते परिंदों की फुर्ती और घोंसले तक पहुँचने की चाह सिखाती है कि ठिकाना ही असली सुकून है। लेकिन यह सांझ अब न गले लगाती है, न मुस्कान भरती है—बस तन चलता रहता है और मन सूखे पत्तों-सा झरता है। खाने की मेज़ पर अब बर्तनों का कोई राग नहीं, न ही निवालों की कोई चिरौरी। पेट भरना भी बस एक कवायद रह गया है। फिर भी गलियारों से आती धूप पतझड़ से मन को बसंत की ओर ताकने पर मजबूर कर देती है। आँखों से बहता नमकीन पानी चुपचाप तकिए में समा जाता है। सुबह आती है, थकी-हारी, पर वही रोज़मर्रा की भागदौड़ मन को थोड़ी राहत देती है। दिन के उजाले में नए चेहरे और कहानियाँ मिलती हैं, और धीरे-धीरे सांझ से रात तक का मलाल भी उतरने लगता है।

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जीवन संघर्ष कविता

ज़िंदगी लेती है नए इम्तिहां

ज़िंदगी हमेशा नए-नए इम्तिहान लेती है। कभी वह मीत बनकर साथ देती है, तो कभी गिला करके दूर चली जाती है। दिल में आने वाले हर दिलकश एहसास का ज़रिया भी वही है। वह कभी हमें प्यार करना सिखाती है, तो कभी अहंकार से टकरा देती है। हर मोड़ पर उसके इम्तिहान अलग होते हैं—कभी तेज़ आँधियों के थपेड़े, तो कभी दर्द से भरा लंबा कारवाँ।

ऐसा मन होता है कि चाँद का एक टुकड़ा और आसमान की एक मुट्ठी पाकर, उन्हें पर्स में छुपा लिया जाए, ताकि कुछ पल सुकून के मिल सकें। उलझनों के बीच भी ज़िंदगी का ही सहारा है, पर उसकी खुशियों की चादर के नीचे दर्द का पाला भी बिछा है। सपनों के परिंदे अब भी उड़ान भरते हैं, मगर छोटे-छोटे ज़ख्म मिलकर एक काफ़िला बन गए हैं। ज़िंदगी ही मेरी साज़ है और मेरी सदा भी। उसी के साथ जीया है और उसी में मैंने अपने भगवान को खोजा है। हर लम्हा नया था, हर दर्द सहा—लेकिन अब दिल चाहता है कि वह थोड़ा ठहर जाए और मेरी हथेली में कुछ हसीं फूल खिला दे।

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