“तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

तुम्हारे खतों का वह पुलिंदा, जिसे मैंने संदूक में संभाल रखा था, मेरे लिए समय की किताब बन गया है। हर खत अपनी कहानी कहता है कभी देर से उठने की डांट और चाय के ठंडे निशान याद दिलाते हैं, तो कभी तुम्हारी छुटकी की मुस्कान और टीचर की डांट में बचपन की मासूमियत झलकती है। कुछ खत चोट के निशानों, पहली तकरार की मिठास या पहला चुंबन याद दिलाते हैं।

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रेशमी कंबल

मीनाक्षी वर्मा, लेखिका, नई दिल्ली बहुत पुराने वक्त की बात है। सीताराम नाम का एक आदमी झोपड़ी में रहता था और मजदूरी किया करता था। एक बार मजदूरी करते वक्त उसने एक आदमी को रश्मि कम्बल बेचते देखा। कम्बल देखकर उसका उसे खरीदने का मन हुआ, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे।वह घर आकर भी…

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