गलतफहमियांँ
गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।

गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।
यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।
यह रचना एक छूटी हुई कॉल के बहाने मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध, थकान और रिश्तों की अनकही दूरियों को उजागर करती है। रोज़मर्रा की भागदौड़, शारीरिक पीड़ा और मानसिक उलझनों के बीच छूटे छोटे-छोटे क्षण किस तरह गहरे पछतावे में बदल जाते हैं, यही इसका केंद्र है। एक साधारण-सी छूटी कॉल यहाँ जीवन के बड़े संकट, टूटते संबंधों और भीतर की असुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।
इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”