माँ का पीतल का संदूक

माँ का पीतल का संदूक—छोटा, पर सोने-सा चमकता। उसमें सहेजे गए गहने, सिक्के, पान और यादें पीढ़ियों की परंपरा और स्नेह का दीप हैं। बचपन से मुझे खींचने वाला यह संदूक अब मेरी नई यादों और ज्वेलरी का घर बन गया है।

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गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

शिक्षक जीवन के आधार स्तंभ होते हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर नया आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल और अबोध मन को गढ़ते हैं। बचपन में माता-पिता से बोलना, चलना और सहारा लेना सीखा जाता है, लेकिन जब शिक्षा के मंदिर में पहला कदम रखा जाता है, तब बच्चा पहली बार माता-पिता का हाथ छोड़कर एक नए वातावरण में प्रवेश करता है।

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राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

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गांव में क्या रखा है…

लोग कहते हैं, “गांव में क्या रखा है?”
पर मेरे लिए गांव सिर्फ एक जगह नहीं, मेरे बचपन की थाती है।

वहीं दादी की कहानियां थीं, मां के हाथों से खाया निवाला था, नीम की ठंडी छांव, खेतों की हरियाली और चौपाल की गर्मजोशी थी। कुएं का पानी, पगडंडियों की धूल और पुराने बक्सों में बंद वो मासूम दिन – सब वहीं छूट गए हैं।
गांव की मिट्टी में सिर्फ धूल नहीं, मेरी जड़ें हैं।
जो कहते हैं “गांव में कुछ नहीं रखा,”
शायद उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं।

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