gulmohar

शब्द मेरे भाव मेरे

निरुपमा सिंह, बिजनौर उमड़ते भावों कोशब्दों में उकेरनान जाने यह शौक !कब और कैसे पनप गयानन्हा पौधा था जोअब वृक्ष बन गयाकुछ तो बचपन से ही थाप्रकृति का सान्निध्य मिलास्वयं ही हरा-भरा हो गयापानी के स्पर्श मात्र से हीखूब फल-फूल गयाउर्वरा के सान्निध्य मेंदोगुना हो गयामानों इच्छाओं कोखुला आकाश मिल गया। Post Views: 414

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इंद्रधनुष

एक उजली किरण के छू जाने से मन का चमन संदल-सा हो गया। ज़िंदगी फिर एक बार ख़ूबसूरत लगी, जैसे खुला आसमान ख़्वाहिशों को नई उड़ान दे गया हो। प्रेम की तरंगें, अधरों की मुस्कान, स्वप्न-सज्जित नयन, और मन की मंज़िल को पाई लगन — हर पंक्ति प्रेम, सौंदर्य और आत्मिक उल्लास से भीगी हुई है।

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कैक्टस

वो कभी तन्हा न लगता है, गमले में भी कितना ख़ुश रहता है… कैक्टस की तरह जो जीवन की हर सख़्ती में भी मुस्कुराता है। न धूप की शिकायत, न छाँव की उम्मीद—बस अपनी मौजूदगी में जीता हुआ एक प्रतीक उम्मीद का।

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सुबह की रोशनी में दीवार के कोने में जाल बुनती मकड़ी, पास में खिड़की से आती हल्की धूप

उम्मीद के जाल में उलझी मैं

“हां……
यही तो करती हूँ मैं भी हर दिन ….
हर सुबह मैं भी तो ढेरों उम्मीद,
कुछ ख्वाबों-ख्वाहिशों का लेकर
ताना-बाना,
बुनने लगती हूँ अनवरत
एक जाल भीतर अपने l”

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