कर्म का फल
आज जिस तरह फूटे घड़े से सूखे पौधों पर पानी गिरा और फूल खिल उठे, उसी तरह आज मेरे कर्मों का फल मुझे मेरे पोते की सफलता के रूप में मिला है।”

आज जिस तरह फूटे घड़े से सूखे पौधों पर पानी गिरा और फूल खिल उठे, उसी तरह आज मेरे कर्मों का फल मुझे मेरे पोते की सफलता के रूप में मिला है।”
निरुपमा सिंह, बिजनौर उमड़ते भावों कोशब्दों में उकेरनान जाने यह शौक !कब और कैसे पनप गयानन्हा पौधा था जोअब वृक्ष बन गयाकुछ तो बचपन से ही थाप्रकृति का सान्निध्य मिलास्वयं ही हरा-भरा हो गयापानी के स्पर्श मात्र से हीखूब फल-फूल गयाउर्वरा के सान्निध्य मेंदोगुना हो गयामानों इच्छाओं कोखुला आकाश मिल गया। Post Views: 414
“हां……
यही तो करती हूँ मैं भी हर दिन ….
हर सुबह मैं भी तो ढेरों उम्मीद,
कुछ ख्वाबों-ख्वाहिशों का लेकर
ताना-बाना,
बुनने लगती हूँ अनवरत
एक जाल भीतर अपने l”