हरी दूब

“हरी दूब” कविता जीवन की आपाधापी में सुकून के छोटे-छोटे क्षणों की तलाश है, जहाँ आकाश के बदलते रंग, श्रमिक की दुआ और घास की मुलायम हरियाली मिलकर मनुष्य को ठहरने और महसूस करने का अवसर देते हैं।

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बीज से वृक्ष तक: विनम्रता की यात्रा

बीज से अंकुरित होकर वृक्ष बनना सिर्फ़ बढ़ना नहीं
यह धूप, बारिश, तूफ़ान और समय का कठोर परीक्षण है। अहंकारी डालियाँ टूट जाती हैं, घमंडी पत्ते उड़ जाते हैं, पर जड़ों वाला पुराना वृक्ष अडिग खड़ा रहता है। उसी की छाँव में नई कोंपलें जन्म लेती हैं मजबूत, विनम्र, और जीवन का नया सबक लिए हुए।

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