ख्यालों में आता रहा…

वह ख्यालों में बार-बार आता रहा कभी याद बनकर सुलाता, कभी कसक बनकर रुलाता। कभी ज़ख़्मों पर मरहम था, तो कभी दिल की आग। साँसों में उसकी महक थी, बारिश की तरह वह बरसता रहा। जब दिल के दरवाज़े खुले, तो वही धड़कन बनकर बस गया। समय बेरहम था, इश्क़ पर परदा रहा और मैं, हर टूटन के बाद भी उसी को महसूस करती रही।

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दिल के ये जख्‍म…

यह कविता दिल के जख़्मों और दर्द को शब्दों और संगीत के रूप में ढालने की बात करती है। इसमें भाव है कि दिल अपने हर दर्द, हर टूटे सपने और हर बिखरे पल को सहेजकर उन्हें गीत, नग़मा और ग़ज़ल में बदल देता है। दुख और तकलीफ़ भी जब सुर और लय में ढलते हैं तो वे मधुर तराने बन जाते हैं। हर अक्षर एक दास्तां कहता है, हर धड़कन में संगीत छिपा है, और हर ग़म को गीत एक मीठे अहसास में बदल देता है। यह दृष्टिकोण जीवन को केवल तकलीफ़ों की कहानी न मानकर, उन तकलीफ़ों को एक सुंदर अफ़साने और मधुर यादों में ढालने की प्रेरणा देता है।

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