“रिश्तों की श्वास: विश्वास”

जिस प्रकार जीवन के लिए श्वास लेना आवश्यक है, उसी प्रकार रिश्तों को जीवित रखने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि रिश्तों में शक, झूठ और अवसाद जैसी अशुद्ध वायु भर जाए, तो उनका दम घुटने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्वयं सकारात्मक रहें और अपने रिश्तों को विश्वास की स्वच्छ हवा प्रदान करें, क्योंकि इन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है – किसी और की नहीं।

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नज़रिया…!

अगर हमारी सोच सकारात्मक और निर्मल है तो हम साधारण को भी असाधारण बना सकते हैं। परंतु यदि हम नकारात्मकता और पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं तो अच्छे से अच्छे में भी खोट ढूंढ़ लेंगे। प्रस्तुत लघुकथा एक सरल उदाहरण के माध्यम से यही संदेश देती है कि कई बार दोष न सामने वाले का होता है, न परिस्थिति का, बल्कि हमारी अपनी “नज़र” का होता है — जिसे बदलकर ही हम दुनिया को सही रूप में देख सकते हैं। जब तक हम अपनी खिड़की के शीशे साफ नहीं करते, हर दृश्य धुंधला और दोषपूर्ण ही नज़र आएगा।

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