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खरगोश-सा नाज़ुक दिल

एक स्त्री थी, जिसका दिल खरगोश-सा नाज़ुक था। वह चाहती थी कि जीवन हँसी और प्रेम की बारिश से भीगे, पर उसकी भावनाओं को कभी महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। ओस से भीगी घास को छूकर मुस्कराने की उसकी चाहत, दूसरों की कठोरता में दबकर रह गई। स्थूल प्रेम की निरंतर चोटों ने उसे भीतर से घायल कर दिया।

फिर एक दिन पछुआ हवा चली, बादल घिर आए और घनघोर वर्षा होने लगी। उस वर्षा में भीगते हुए उसने पहली बार अपने भीतर-बाहर बादलों का स्पर्श महसूस किया। हवा की अनंत यात्रा आकर उसकी छाती पर ठहर गई, और उसके भीतर का नाज़ुक दिल धड़कता रहा। जीवन के बेस्वाद गिलास में अचानक प्रेम का रंग घुलने लगा।

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