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खयालों की दहलीज पर…

बड़े अदब के साथ अल्फाज़ खड़े हैं, खयालों की दहलीज पर। मौन से हारे हुए हुड़दंग भीतर ही भीतर मच रहे हैं। जज़्बातों से सराबोर, अल्फाज़ मचल तो रहे हैं, पर तमीज़ ने उन्हें रोक रखा है, इस तरह कि वे सरेआम बाहर नहीं आ पा रहे।इसलिए बेचारे अल्फाज़ सहम गए हैं, किसी नकाबपोश औरत की तरह। अब उन्होंने अपने अभिव्यक्ति का एक जरिया ढूंढ लिया है। इसी वजह से आजकल उनकी आंखें भी बोलने लगी हैं—वो भी, अल्फाज़ों के परे।

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