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उज्जैन फिर उज्जयिनी हो जाए

उज्जैन को उज्जयिनी नाम से फिर पहचान दिलाने का प्रयास चल रहा है — एक ऐसी नगरी जो विक्रमादित्य की राजधानी रही, कालिदास और भर्तृहरि की कर्मभूमि रही और जिसे साहित्य, ज्योतिष, संस्कृति और खगोल-विज्ञान की जन्मस्थली माना गया। पंडित सूर्य नारायण व्यास ने विक्रमादित्य की विरासत और उज्जयिनी के गौरव को पुनर्स्थापित करने में महती भूमिका निभाई। आज उज्जैन धार्मिक पर्यटन का केंद्र तो बन गया है, लेकिन उस उज्जयिनी का साहित्यिक, सांस्कृतिक वैभव खोता जा रहा है। अब समय है कि उज्जयिनी को उसका प्राचीन गौरव फिर से मिले — नाम से, संवत् से और सांस्कृतिक पहचान से।

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पलाश के सामने एक खिड़की

नगर-सीमान्त पर जहाँ मेरा बसेरा है, उसके ठीक सामने पलाश का एक पेड़ है… जब से उस पर पलाश के अंगारे खिले हैं, मन शरविद्ध हरिण की भाँति बार-बार वहीं चला जाता है। जैसे फूल रौशनी हों। और फूलों का न होना रात्रितिमिर, जिसमें पेड़ आँख से ओझल हो जाएं… वसंत से बड़ा निर्मोही कौन है?

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