तलाश

ज़िंदगी में तलाश रास्तों की नहीं, मंज़िल की होती है। इंसान कभी-कभी जीवन की भीड़ में इतना आगे बढ़ जाता है कि खुद से ही दूर हो जाता है। सुख चैन नहीं लेने देता और दुख नींद छीन लेता है, पर हम मुस्कुराते हुए सब झेलते हैं जैसे बेफ़िक्री में गुज़र रही ज़िंदगी को बस देखते जा रहे हों। असल खोज जीवनभर खुद को पाने की ही रहती है।

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स्वयंसिद्धा

ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठी मैं अपने भीतर के तूफ़ानों को सुन रही थी। एक युवक आया और बोला. “कितनी भव्य है ये नदी।” मैंने कहा “हाँ, पर इसे बहने के लिए गिरना, टूटना पड़ा है। इसी टूटने में इसकी पहचान है।”

मैंने अपने हाथों को देखा — हर झुर्री जैसे किसी मोड़ का निशान। बोली — “हर औरत के हिस्से में भी एक नदी होती है, जो बहती है, कभी बाढ़ बनती है, कभी शांत, लेकिन अंत में अपने सागर तक पहुँच जाती है।” वो चुप रहा, बस मुझे ऐसे देखा जैसे कोई नदी को देखता है। अब वो मुझसे अपने उत्तर खोजता है, और मैं मुस्कुरा देती हूँ क्योंकि जवाब किताबों में नहीं, नदियों में बहते हैं। मैं स्वयंसिद्धा हूँ. अपने भीतर के ब्रह्मपुत्र को स्वीकार कर चुकी हूँ। अब मुझे कहीं पहुँचना नहीं, बस बहते रहना है।

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खरगोश-सा नाज़ुक दिल

एक स्त्री थी, जिसका दिल खरगोश-सा नाज़ुक था। वह चाहती थी कि जीवन हँसी और प्रेम की बारिश से भीगे, पर उसकी भावनाओं को कभी महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। ओस से भीगी घास को छूकर मुस्कराने की उसकी चाहत, दूसरों की कठोरता में दबकर रह गई। स्थूल प्रेम की निरंतर चोटों ने उसे भीतर से घायल कर दिया।

फिर एक दिन पछुआ हवा चली, बादल घिर आए और घनघोर वर्षा होने लगी। उस वर्षा में भीगते हुए उसने पहली बार अपने भीतर-बाहर बादलों का स्पर्श महसूस किया। हवा की अनंत यात्रा आकर उसकी छाती पर ठहर गई, और उसके भीतर का नाज़ुक दिल धड़कता रहा। जीवन के बेस्वाद गिलास में अचानक प्रेम का रंग घुलने लगा।

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