झंकार में दबा इंतज़ार
पायल और कंगनों की झंकार के बीच प्रेमिका अपने ही मन की उलझनों में बंधी है। आँसू, उदासी और अधूरी चाहत उसे प्रिय से मिलने से रोक रही हैं, और रात चाँद के साथ उसका मौन साक्षी बन जाती है।

पायल और कंगनों की झंकार के बीच प्रेमिका अपने ही मन की उलझनों में बंधी है। आँसू, उदासी और अधूरी चाहत उसे प्रिय से मिलने से रोक रही हैं, और रात चाँद के साथ उसका मौन साक्षी बन जाती है।
घर मेरा किसी अनजानी ख़ुशबू से महकने लगा था। जाने क्यों, हर कोने में उसकी आहट गूंजने लगी। फ़िज़ाओं में कोई चाप नहीं थी, फिर भी सन्नाटा जैसे टूटने लगा। मैंने तो किवाड़ बंद रखे थे, पर लगता है कोई ख़्वाब दरवाज़ा खटखटा गया। रातें अब पहले जैसी तन्हा नहीं रहीं — एक उम्मीद थी कि शायद दूरी मिटेगी, और इसी ख़याल से दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। जब आखिर मैंने दरवाज़ा खोला, तो हवाओं के साथ आए अरमानों का दीया बुझ गया — जैसे किसी अधूरी मुलाक़ात ने अपनी कहानी वहीं ख़त्म कर दी हो।