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पाबल में आयोजित प्रवचन सभा के दौरान आचार्य श्री राजरक्षितसूरिजी समाज में सच्चे इंसान के अभाव और पर्यावरण संरक्षण पर विचार रखते हुए

सच्चे इंसान का सबसे बड़ा अकाल

पाबल स्थित श्री पद्मप्रभ स्वामी जिनालय में आयोजित प्रवचन सभा में आचार्य श्री राजरक्षितसूरिजी ने कहा कि दुनिया में सबसे बड़ा अकाल पानी, अनाज या पेट्रोल का नहीं बल्कि सच्चे इंसान का है, और यदि समय रहते स्वार्थ, भ्रष्टाचार और प्रकृति के विनाश को नहीं रोका गया तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा और पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा.

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नया साल

यह रचना सालों के बदलने के बहाने मनुष्य की आदतों, हिंसा और संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य है। 2025 और 2026 के संवाद के माध्यम से कवि यह प्रश्न उठाता है कि क्या नया साल सच में नया होता है, या वही पुरानी शरारतें नए कैलेंडर के साथ आगे बढ़ जाती हैं।

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कैसे करूं बयाँ…

केदारनाथ की कठोर ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच एक मासूम बालक का निश्छल प्रेम यह सिखा गया कि सच्ची मानवता किसी सुविधा या संपन्नता की मोहताज नहीं होती. वही निस्वार्थ सेवा जीवन भर स्मृति बनकर हृदय में बस जाती है.

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जिंदगी भर नहीं भूलेगी मेट्रो की वो रात…

एक भागती-दौड़ती मुंबई की रात में, मैं मेट्रो के सफर पर थी, अपने बैग और गिफ्ट बॉक्स के साथ, साड़ी में शाही अंदाज़ लिए। एक अजनबी सज्जन ने बिना किसी शब्द के मेरी मदद की, मेरा सामान लौटाया और बाद में टिकट लेने में भी सहायता की। हमारी अनौपचारिक बातचीत, मुस्कानें और छोटे-छोटे इशारे उस रात को यादगार बना गए। सफर के बीच हमारी बातचीत इतनी सहज और हल्की थी कि समय का पता ही नहीं चला। उनके व्यवहार में न तो अश्लीलता थी, न कोई लालसा सिर्फ मित्रवतता और आदर।

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हम गज़ल कहने लगे…

जब से लोग खून-खराबे को भी उत्सव का नाम देने लगे, तभी से पुराने घाव फिर से हरे होने लगे। शहर इतना खामोश हो गया है कि हादसों की आवाज़ भी नहीं उठती, क्योंकि यहाँ खुशनुमा चेहरों के बीच कलमें झुककर रह गई हैं। घुँघरुओं का दर्द अब नया नहीं लगता, क्योंकि बारूद से सजे कारवाँ चलने लगे हैं। इशारों की भाषा भी लोगों को समझ नहीं आती, दोस्ती के हाथ बेवजह कटने लगे हैं। सहमी हुई फिज़ाओं में रात भी ढलती नहीं, क्योंकि मोहब्बत के दिए तूफ़ानों से लड़ने लगे हैं। और यही कारण है कि ‘राकेश’ अब सियाह रातों में सर नहीं उठाता क्योंकि जंगें हारने के बाद लोग ग़ज़लें कहने पर मजबूर हो जाते हैं

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सोच

सोच ही हमें भीड़ से अलग करती है। दौलत नहीं, असली संपत्ति हमारी सोच है जो जीना सिखाती है, दोस्त मिलाती है, और इंसान को महान बनाती है।

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दिल-ओ-दिमाग़

कभी-कभी एक शब्द चुभ जाता है और दिल-दिमाग़ उलझ जाते हैं। लेकिन जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखते हैं, तो समझ आता है कि क्रोध विवेक छीन लेता है और मन को भटका देता है। मानव बने रहने के लिए मन-मानस का तालमेल जरूरी है।

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भीड़

भीड़ के बीच बैठी खून से लथपथ घबराई लड़की को युवक ने अपना कोट ओढ़ाकर उठाया, और तमाशा देखती भीड़ पर गुस्से से गरज उठा.“अगर आपकी बेटी होती, तो भी ऐसे ही खड़े रहते?”

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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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टूटना एक डाल का…

जीवन की आंधियाँ जब चलती हैं, तो सिर्फ डालियाँ ही नहीं, कई बार इंसान भी टूट जाते हैं . अपने ही सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से। इस टूटने में भी एक सच्चाई है जैसे परिंदों के घोंसले बिखर जाते हैं, पर वे नई जगह फिर से घर बना लेते हैं। कोयल की तान कहीं खो जाती है, मगर उसकी खोज जारी रहती है। यही जीवन का शाश्वत चक्र है . गिरना, बिखरना और फिर उठना।

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