प्रकृति की पुकार
जिज्ञासा सिंह, (पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार एवं ब्लॉगर), लखनऊ आसमान को छू रहा, ऊँचा खड़ा विकास।पशु-पक्षी बेघर हुए, खोजें निज आवास।। प्लॉटिंग के बाज़ार में, बिकते चारागाह।घर-घर छुट्टा जानवर, व्यापारी की वाह।। उमड़-घुमड़ रोती रही, बदली नभ में आज।सर, सरिता और कूप के, बैरी करते राज।। मेढ़क प्यासा ढूँढ़ता, अपना खोया कूप।कंकड़-पत्थर हैं वहाँ, बदल गया…
