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जब स्त्री प्रेम करती है….

वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।

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“कब कह पाएंगे दिल की बात”

सोनम और राजा की कहानी ने एक बार फिर ये सवाल उठाया है — क्या हमारे समाज में किसी लड़की को सच कहने की आज़ादी है? जब रिश्तों में संवाद की जगह चुप्पी ले लेती है, तब वही चुप्पी कभी किसी की जान ले सकती है… और कभी किसी की जान बचा भी सकती है।

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गलतफहमियांँ

गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।

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प्रेम…हुई शाम उनका ख़्याल आ गया… 🎵🎶

रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।

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वापसी के रास्ते….

“जब हम इश्क़ की राह पर चलते हैं, तो सब कुछ नया, ताज़ा और सुंदर लगता है। लेकिन वही राह जब लौटने की बनती है, तो हर पेड़, हर हवा, हर मोड़ अजनबी सा लगता है। इश्क़ के रास्ते पर हम खुद को कहीं पीछे छोड़ आते हैं… और वापसी की राह असल में उसी खोए हुए ‘ख़ुद’ की तलाश बन जाती है।”

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यदि प्रेम में होते बुद्ध…

अगर बुद्ध प्रेम में होते, तो शायद वे किसी वृक्ष की छाया के बजाय किसी प्रिय की मुस्कान को ध्यानस्थ होने का स्थान चुनते। उनके उत्तर तब भी मौन होते, लेकिन उस मौन में प्रेम की एक गहरी समझ समाई होती। वे प्रेमिका की आँखों में जीवन का अर्थ खोजते, जैसे निर्वाण की झलक किसी मानस में देख रहे हों। वे प्रेम को उसी तरह थामते जैसे उन्होंने उस कटोरे को थामा था जिसमें संसार का सारा दुःख समाया था—बिना अपेक्षा, बिना आहट। उनका प्रेम निःस्वार्थ और निर्लिप्त होता, जैसे संन्यास लिया हो—पूरी तरह समर्पित, फिर भी पूर्ण स्वतंत्र। न उसमें मोह होता, न विरक्ति—सिर्फ सहज स्वीकृति। प्रेम, उनके लिए, कोई उन्माद नहीं बल्कि एक शांत, स्थिर जलधारा होता, जो “मैं” और “तू” के पार ले जाती। तब शायद हम भी समझ पाते कि प्रेम भी एक मार्ग है—मोक्ष की ओर, जहाँ खोना ही पाना है, और समर्पण ही सबसे बड़ा बोध।

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इंद्रधनुष

एक उजली किरण के छू जाने से मन का चमन संदल-सा हो गया। ज़िंदगी फिर एक बार ख़ूबसूरत लगी, जैसे खुला आसमान ख़्वाहिशों को नई उड़ान दे गया हो। प्रेम की तरंगें, अधरों की मुस्कान, स्वप्न-सज्जित नयन, और मन की मंज़िल को पाई लगन — हर पंक्ति प्रेम, सौंदर्य और आत्मिक उल्लास से भीगी हुई है।

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शून्य सा वज़ूद रखा कीजिए 

एक करोड़पति इंसान, जो केवल अपनी कमाई में बढ़ते शून्य और दिखावे की भीड़ में संतुष्टि ढूंढता है, वास्तव में भीतर से सबसे दरिद्र हो सकता है। अमीरी केवल धन से नहीं, बल्कि विनम्रता, आत्म-संयम और नि:स्वार्थ सेवा से मापी जाती है। जो व्यक्ति अपने सामान्य कार्यों को करने में शर्म करता है और केवल दिखावे के लिए दान करता है, उसका अहंकार अंततः उसे अकेला छोड़ देता है। शून्य बनकर रहना सीखिए – जो किसी के साथ जुड़ जाए तो उसकी कीमत बढ़ा देता है, पर स्वयं का कोई घमंड नहीं रखता।

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रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन

साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।

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वे पुरानी सी प्रेमिकाएं…

यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।

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