डिब्बे वाले
“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।

“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।
शीशमहल” हो या “अंतिम प्रश्न”, कविता वर्मा की कहानियाँ उस स्त्री की कथा कहती हैं जो ना केवल अपनी भूमिका से बंधी है, बल्कि अपनी पहचान के लिए छटपटाती भी है। ये कहानियाँ घर के भीतर की उन संकरी गलीयों की पड़ताल करती हैं, जहाँ स्त्री होना एक उत्तरदायित्व नहीं, एक दंड जैसा महसूस होता है। लेखिका का दृष्टिकोण कहीं भी रोमैंटिक नहीं होता, बल्कि बेहद यथार्थपरक और भीतर तक धँसता हुआ है। स्त्री को सहानुभूति नहीं, समझ की ज़रूरत है — यही संदेश इन कहानियों की अंतर्धारा है।”
मुन्नी शायद पाँच साल की थी जब पहली बार उसे मामा के घर भेजा गया। बचपन से ही माता-पिता से दूर रहकर उसने बड़े लोगों के साए में अपना जीवन काटा — कभी बड़ी अम्मा के यहाँ, तो कभी बुआ के पास। पर मुन्नी के जीवन में सबसे कोमल, सबसे निर्मल प्रेम अगर किसी ने उसे दिया तो वो थे बेचन मामा। बेचन मामा के घर में मुन्नी ने पहली बार वो स्नेह पाया जो शायद एक बच्चा माँ-बाप से चाहता है। उनके साथ वह खेलती, रूठती, मनाती और उनके साये में हर डर भूल जाती।
बेचन मामा के बनाए कंडों की कलमों से लिखते हुए उसकी पटरी सबसे चमकती थी, और मामा की सिखाई हुई सुंदर लिखावट में उसका नाम लिखा जाता था। समय के साथ मुन्नी ने जाना कि बचपन में जो छाया उसे मिली, वह सामान्य नहीं थी — वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी, जो हर किसी के हिस्से में कहाँ आती है।
पन्द्रह साल बाद जब वह फिर मामा के घर लौटी, तो उसकी आँखें नम थीं, लेकिन दिल भरा हुआ — मामा की वही मुस्कान, वही स्नेह और वही अपनापन देखकर। उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की — “हे ईश्वर, हर बच्ची को एक बेचन मामा जरूर मिले
रश्मि चौधरी का लघुकथा संग्रह ‘संवेदनाओं का स्पर्श’ समकालीन हिंदी लघुकथा को एक नई चेतस दिशा प्रदान करता है। ये लघुकथाएं केवल आक्रोश, टकराव या विरोध का आख्यान नहीं हैं, बल्कि इनमें मानवीय सहकार, संवेदनात्मक विस्तार और यथार्थ का सधा हुआ समन्वय देखने को मिलता है। संग्रह की रचनाएं जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को बड़ी आत्मीयता और वैचारिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। कभी मनोविज्ञान की परतें खुलती हैं, तो कभी समाजशास्त्रीय संदर्भों का मूक आकलन होता है। ‘दुकानदारी’, ‘अन डू’, ‘सम्मान’, ‘मान्यताएं’ जैसी लघुकथाएं अपनी गहनता और प्रतीकों के माध्यम से पाठक के मन को छू जाती हैं। लेखिका की भाषा-संरचना और कथ्य विन्यास लघुकथा को संवेदना की ऐसी धरती पर स्थापित करते हैं, जहाँ विचार और अनुभूति दोनों का संतुलन है।”
27 साल पहले महू के सात रास्ता स्कूल में एक टाइम बम मिलने की सूचना से हड़कंप मच गया था। संसाधनों की कमी और अफरा-तफरी के बीच प्रशासन, पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने जिस सूझबूझ से हालात को संभाला, वह आज भी यादगार बन गया है। घटना से जुड़े तत्कालीन अधिकारी आज भी इसे याद करते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
भारत की आध्यात्मिक परंपराएं समय के साथ बदलती जरूर रही हैं, पर उनकी आत्मा आज भी उतनी ही जीवंत और शक्तिशाली है। इसका प्रमाण राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर है, जो केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और भक्ति का जीवंत केन्द्र बन चुका है। विशेषकर निर्जला एकादशी और द्वादशी के पावन पर्व पर यहां आस्था का ऐसा महासंगम होता है, जो किसी भी श्रद्धालु के हृदय को अद्वितीय शांति और ऊर्जा से भर देता है।
पोहे तो पोहे हैं — एक ऐसा देसी नाश्ता जो न केवल पेट भरता है, बल्कि दिल भी जीत लेता है। खासकर जब बात हो मराठी कांदा-बटाटे पोहे की, तो फिर स्वाद की बात ही कुछ और होती है। राई, कड़ी पत्ता, प्याज, मूंगफली, नींबू और ऊपर से नारियल की सजावट — हर कौर में बस आनंद ही आनंद। चाहे दडपे पोहे हों या मिसळ पोहे, एक्सपेरिमेंट भले होते रहें, पर असली प्रेम तो उसी ऑथेंटिक स्वाद से है। मराठी शादियों में भी पोहे-चाय की रस्म दिलों को जोड़ने का माध्यम बनती है। आज का दिन कुछ देसी हो जाए
पिछले कुछ वर्षों से अधूरी रह रही कश्मीर यात्रा की इच्छा इस बार पूरी हुई। गर्मियों की छुट्टियों में जब शर्ली और जेमी दोनों घर पर थे, तो परिवार ने दृढ़ निश्चय किया — अबकी बार कश्मीर पक्का! २१ मई को हमने जम्मू के लिए ट्रेन पकड़ी और वहां से शुरू हुआ श्रीनगर की ओर रोमांचक सफर, जिसमें चेनानी-नाशरी सुरंग की तकनीकी भव्यता और घाटियों की नैसर्गिक सुंदरता ने मन मोह लिया। रास्ते की कठिनाइयों के बावजूद श्रीनगर की समतल घाटी का सौंदर्य जैसे हर थकान को हर लेता है। होटल अल-शिमाघ में गर्मजोशी से स्वागत के बाद शुरू हुई हमारी असली कश्मीरी यात्रा — डल झील, मुगल बाग, लाल चौक और हिमालयी सौंदर्य से सराबोर सोनमर्ग, गुलमर्ग, पहलगाम की रोमांचकारी यात्राएं।
जीवन एक-वचन नहीं है। यह दो पत्थरों के रगड़ से जन्मी आग की तरह है—जहाँ दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे को प्रकाशित करता है। यह टकराहट नहीं, रचना है। हम सबके अनुभव अलग हैं, फिर भी जुड़ाव की ज़रूरत अपरिहार्य है। पर आज, हम सिर्फ़ व्यूज में हैं, अंतर्बोध में नहीं। जो घटित हो रहा है, वह केवल घटना नहीं, संवेदना है—लेकिन हम ठहरते नहीं, स्क्रॉल करते जाते हैं।
“हां……
यही तो करती हूँ मैं भी हर दिन ….
हर सुबह मैं भी तो ढेरों उम्मीद,
कुछ ख्वाबों-ख्वाहिशों का लेकर
ताना-बाना,
बुनने लगती हूँ अनवरत
एक जाल भीतर अपने l”