
खुशी सभरवाल अज्ञाती
शब्दकोश ख़त्म हो जाए,
जो उसे शब्दों में उतारूँ मैं…
उसे मेरी भी नज़र न लगे,
कौन-से टीके से वारूँ मैं।
पर मेरा उसका कोई मेल नहीं है,
ये बात मोहब्बत के रास्तों पर कैसे उतारूँ मैं,
और उसे मेरी भी नज़र न लगे,
कौन-से टीके से वारूँ मैं।।
वो परिंदा आसमानों का,
मेरी बस ज़मीन पर उड़ान है।
उसकी महलों की दुनिया में
अपनी झोपड़ी कैसे बना लूँ मैं,
और उसे मेरी भी नज़र न लगे,
कौन-से टीके से वारूँ मैं।।
वो चाँद है…
तो मैं सूरज-सी…
वो आग है…
मैं पानी-सी…
मैं राह हूँ…
वो राहगीर है,
और क्या वो मेरी तक़दीर है?
जब टूट जाऊँ उसको किसी के साथ देखकर,
तो ख़ुद को कैसे सँभालूँ मैं,
उसे मेरी भी नज़र न लगे,
कौन-से टीके से वारूँ मैं।।
कि वो खिलाड़ी है मैदान का,
मैं उसके मैदान की मिट्टी हूँ।
और वो iPhone का ज़माना है,
मैं 90’s की चिट्ठी हूँ।
मैं हूँ अधूरी-सी कहानी कोई,
वो पूरा कोई क़िस्सा है।
वो मिला नहीं मुझे… बिछड़ गया,
मगर फिर भी मेरा हिस्सा है।
वो तक़दीर नहीं है मेरी,
फिर भी उसको प्यार से सँवारूँ मैं,
और उसको मेरी भी नज़र न लगे,
कौन-से टीके से वारूँ मैं।।

Superb