
शारदा कनोरिया, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे
जब शीत ऋतु की नीरव ठंडक धीरे-धीरे विदा लेती है, तब बसंत केवल ऋतु बनकर नहीं आता, वह चेतना का उत्सव बनकर उतरता है। नवांकुर फूटते हैं, सूनी टहनियों पर कोमल कोंपलें मुस्कुराती हैं मानो प्रकृति स्वयं आत्मा को पुनर्जागरण का संदेश दे रही हो। खिले हुए पुष्प, हरियाली से आवृत धरती केवल नेत्रों को ही नहीं भाती, वे अंतःकरण को भी स्पर्श करती हैं। यह बाह्य सौंदर्य दरअसल भीतर के आलोक ही प्रतिबिंब है, जहाँ आत्मा सुप्तावस्था से जागरण की ओर अग्रसर होती है।
गुरुजन बसंत को विरह से जोड़ते हैं. उस विरह से जो पीड़ा नहीं, बल्कि साधना है। आत्मा की वह मीठी तड़प, जो परमात्मा से मिलन के लिए निरंतर व्याकुल रहती है। जैसे धरती सूर्य की ऊष्मा के बिना सूनी और निष्प्राण हो जाती है, वैसे ही आत्मा दिव्य प्रकाश के अभाव में अपनी पूर्णता नहीं पा सकती। बसंत के आगमन से वृक्ष पुष्पित होते हैं, बयार सुगंध से भर जाती है, धरती सौंदर्य के शृंगार में डूब जाती है और उसी क्षण यदि साधक सजग हो तो आत्मा भी नाम-स्मरण की सुवास से महक उठती है।यह ऋतु हमें स्मरण कराती है कि सच्चा बसंत बाह्य ऋतु में नहीं, अंतरात्मा के उपवन में खिलता है।ईश्वर-स्मरण ही उसका बीज है, और प्रभु-नाम की होली उसका परम उल्लास।
जब बसंत आए, तो केवल प्रकृति को न निहारें अपने भीतर भी प्रेम, करुणा, क्षमा और सद्गुणों के पुष्प रोपित करें। क्योंकि वही आत्मिक बसंत मानव जीवन को पूर्णता और प्रकाश की ओर ले जाता है।
