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सुरों में विनम्रता, स्वर में विरासत

पुणे में वसंतोत्सव का समापन राहुल देशपांडे के बहारदार राग चंद्रकंस से हुआ। कुमार गंधर्व परंपरा, युवा कलाकार और शास्त्रीय संगीत के भविष्य पर विशेष रिपोर्ट।

राग चंद्रकंस के जरिए राहुल देशपांडे ने युवा कलाकारों को दिया आत्ममंथन का मंत्र

पुणे, 18 जनवरी
तेज़ रफ्तार और तात्कालिक मनोरंजन के दौर में जब शास्त्रीय संगीत के मंच सीमित होते जा रहे हैं, ऐसे समय में वसंतोत्सव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि परंपरा और प्रयोग साथ चल सकते हैं। तीन दिवसीय वसंतोत्सव का समापन राग चंद्रकंस के माध्यम से हुआ, लेकिन यह केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा थी. जिसे राहुल देशपांडे ने सुरों के माध्यम से जीवंत किया।

राहुल देशपांडे का गायन मंच पर प्रस्तुति भर नहीं था, बल्कि गुरु-परंपरा के प्रति विनम्र स्वीकारोक्ति भी थी। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पं. कुमार गंधर्व की गायकी अनुकरण की नहीं, अनुभूति की चीज़ है। यह स्वीकार आज के युवा कलाकारों के लिए एक बड़ा संदेश है. कि महान परंपराओं को दोहराने के बजाय उन्हें आत्मसात करना अधिक महत्वपूर्ण है।

वसंतोत्सव का मंच केवल प्रतिष्ठित कलाकारों तक सीमित नहीं रहा है। यह उत्सव निरंतर युवा प्रतिभाओं को मंच देकर शास्त्रीय संगीत के भविष्य की नींव मजबूत कर रहा है। इस दृष्टि से राहुल देशपांडे का कथन“मैं छोटा कलाकार हूं, अभी बहुत कुछ करना बाकी है” आत्ममंथन और सृजनशीलता का प्रतीक बनकर उभरा।

कबीर की रचना ‘साहिब है रंगरेज…’ और ‘तीर्थ विठ्ठल, क्षेत्र विठ्ठल…’ जैसे अभंगों के चयन ने यह संकेत दिया कि आज का शास्त्रीय मंच केवल रागों तक सीमित नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संवाद का माध्यम भी बन रहा है।

वरिष्ठ अभिनेता नाना पाटेकर का यह कहना कि नई पीढ़ी की प्रतिभा के सामने वे स्वयं को “थिटा” महसूस करते हैं, इस बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य को रेखांकित करता है। वसंतोत्सव जैसे आयोजन युवा कलाकारों को न केवल मंच देते हैं, बल्कि आत्मविश्वास और दिशा भी प्रदान करते हैं।

परंपरा, प्रयोग और भविष्य इन तीनों के संतुलन का नाम ही वसंतोत्सव है। राग चंद्रकंस की गूंज के साथ यह संदेश भी गूंजता रहा कि शास्त्रीय संगीत किसी बीते समय की स्मृति नहीं, बल्कि आने वाले कल की चेतना है।

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