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सच्चा साथी, सच्चा प्रेम

डॉ. नेत्रा रावणकर, उज्जैन

यह सच है कि तूने मुझे
चाहा भी है बहुत
लेकिन मेरी आंखों को
रुलाया भी बहुत-बहुत…..

साहिल से उसने मुझे
पुकारा तो है आख़िर
मँझधार में तिनके का
सहारा ही बहुत – बहुत……

जो बांटता – फिरता है
जमाने भर को उजाले
उस शख़्स के दामन में
अंधेरा है बहुत -बहुत…..

उसकी कत्थई आंखों में
हरदम बसने वाला
दिलदार भी है
उसे प्यारा है बहुत-बहुत

हमेशा मेरी हक़ में
दुआ करनेवाला
अदा करती हुं
तेरा शुक्रिया बहुत – बहुत

फक्र है मुझे नहीं बिछुड़
सकता वह जीवन भर
हर वक्त उसने मेरा
साथ निभाया है बहुत – बहुत…

One thought on “सच्चा साथी, सच्चा प्रेम

  1. ” जो बांटता – फिरता है
    जमाने भर को उजाले
    उस शख़्स के दामन में
    अंधेरा है बहुत -बहुत…..”
    कोई शख़्स सम्पूर्ण नहीं , हरेक के पास बांटने को अच्छाई भी होती है और अग्यान का अन्धेरा भी जिससे संवेदनशील रिश्ते आंसुओं मे डूबते भी हैं । अगर व्यक्ति महत्वपूर्ण है तो क्षमा करना ही श्रेष्ठ है।
    बहुत सटीक विश्लेषण किसी भी व्यक्तित्व पर ।

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