वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

बचपन भी गजब का होता है। एक बार आप देखो तो सही पीछे मुड़कर आप खुद ही देखोगे कि हम क्या थे और क्या हो गए। न कोई छल-कपट, न कोई राग-द्वेष, न कोई ईर्ष्या, न कोई मान-अपमान का डर, न चिंता। बस वही मासूमियत, वही जिज्ञासा और वही खुशी। इस चित्र के पात्र बचपन में हम सभी रह चुके हैं।उस समय कभी यह दिमाग में नहीं आया कि कोई क्या सोचेगा, लोग क्या कहेंगे। जिन्होंने यह जीवन जिया, आज वह भले ही कितने भी अमीर हो गए हों, उनके अंदर इंसानियत तो जिंदा होगी ही। वह एक संवेदनशील इंसान होंगे ही. यह मेरा दावा है।

रविवार का दिन तब कुछ अलग ही रोमांस लेकर आता था। सुबह-सुबह नहा-धोकर (कभी-कभी बिना नहाए-धोए भी) टीवी के सामने बैठ जाना, रंगोली में शुरू में पुराने और बाद में नए गीतों का इंतजार करना। जंगल बुक देखने के लिए, जिन दोस्तों के यहाँ टीवी नहीं होता, उनका घर आना या उनके घर टीवी देखने जाना। शनिवार और रविवार की फिल्मों का इंतजार, किसी नेता के मर जाने पर सीरियल या फिल्म ना आने पर भला-बुरा कहना, मूक-बधिरों के समाचारों की एंकर के इशारों की नकल करना। हवा में घूमती एंटिना को छत पर जाकर ठीक करना, तस्वीर स्पष्ट होने तक नीचे आवाज़ लगाकर पूछना- आया क्या?” स्क्रीन पर काले-सफ़ेद दानों के साथ भी फिल्में देखना और उसका भरपूर आनंद लेना।

जिनके घर टीवी नहीं होता था, वे दूसरों के घर जाकर जम जाते। सुबह रंगोली से लेकर रामायण-महाभारत खत्म होने तक, उस समय ऐसा लगता था जैसे पूरी दुनिया वहीँ ठहरी हुई है। कई बार, जिनके घर टीवी देखने जाते, रामायण-महाभारत खत्म होने के बाद भगा दिए जाते-“जाओ, अब कुछ नहीं आएगा” और ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का शटर बंद। फिर भी दिल मानता ही नहीं। घर के बाहर ही पर्दे की आड़ से, दरवाजों की दरारों से टीवी देखने की तमन्ना बनी रहती थी।

जिनके घरों में टीवी नहीं होते थे, उनके लिए महिदपुर रोड में तीन जगह थीं-पहली पंचायत में, दूसरी पिल्लई साहब के यहाँ और तीसरी शुगर मिल की कोठी में। वहाँ जाकर फिल्म, रंगोली, चित्रहार, चंद्रकांता, रामायण और महाभारत का लुत्फ उठाया जा सकता था।

और अब… वो रविवार नहीं आता। हर दिन बस सोमवार जैसा लगता है. काम, ऑफिस, बॉस, बच्चे। दोस्तों से दिल की बातों का इज़हार नहीं हो पाता।

पर जब भी मैं उन बचपन की यादों को याद करता हूँ, वह मासूमियत, वह जिज्ञासा और वह खुशियाँ फिर से मेरे दिल में जी उठती हैं। कागज़ की कश्ती, बारिश में भीगना, दोस्तों के साथ हँसी-मजाक और निश्चिंत दुनिया… ये सब पल, भले बड़े होकर खो गए हों, फिर भी मेरी आत्मा में जिंदा हैं।

और यही यादें हमें इंसान बनाती हैं संवेदनशील, समझदार, और खुश रहने वाली। भले जीवन अब व्यस्त और जिम्मेदारियों से भरा है, पर अंदर वही छोटा बच्चा अभी भी है, बारिश में कागज़ की कश्ती बहा रहा है, और हर याद मुस्कुराकर हमें बुला रही है।

3 thoughts on “वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

  1. बचपन वाली यादें….. यादें हमें संवेदनशील तो बनाती है, लेकिन क्या दूसरों के प्रति भी?
    बहुत बढ़िया यादें !

  2. बिल्कुल सच लिखा है आपने। यही सब होता था और भगा ही नहीं दिए जाते थे बल्कि कई बार तो बैठने के लिए डरे सहमे से जमीन का एक कोना मिलता था ।यह डर बना रहता था कि पता नहीं कब हमें कोई भगा देगा… आपकी यादों के साथ हम हमारा बचपन जीते हैं यूं ही लिखते रहें🙏🙏

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